मलमास और खरमास के बीच का अंतर: जानें क्या है विशेषता

मलमास और खरमास के बीच का अंतर समझना महत्वपूर्ण है। जबकि मलमास को आध्यात्मिक रूप से पवित्र माना जाता है, खरमास में मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। जानें इन दोनों महीनों की विशेषताएँ और धार्मिक मान्यताएँ।
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मलमास और खरमास का महत्व

अभी मलमास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, चल रहा है। कई लोग मलमास और खरमास को एक ही समझते हैं, लेकिन इन दोनों का महत्व अलग-अलग है। ज्योतिष और खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से इन दोनों में महत्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं। मांगलिक कार्यों को मलमास और खरमास दोनों में नहीं किया जाता है, यही कारण है कि लोग इन्हें एक समान मान लेते हैं। आइए, जानते हैं कि इन दोनों महीनों में क्या अंतर है।


खरमास की विशेषताएँ

खरमास साल में दो बार आता है, एक बार दिसंबर-जनवरी में और दूसरी बार मार्च-अप्रैल में। ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य देव बृहस्पति की राशियों, धनु और मीन में प्रवेश करते हैं, तब खरमास का आरंभ होता है। इस दौरान सूर्य की ऊर्जा कम हो जाती है, जिससे शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए यह समय अनुकूल नहीं माना जाता।


मलमास की विशेषताएँ

मलमास के दौरान भौतिक मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है, लेकिन इसे आध्यात्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है। इस महीने में तुलसी पूजा, दीपदान, और श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है। मलमास का संबंध सूर्य और चंद्रमा के दिनों के अंतर को संतुलित करने से है। हर तीन साल में हिंदू कैलेंडर में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे मलमास कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस महीने का कोई स्वामी नहीं था, इसलिए इसे 'मलमास' कहा गया। भगवान विष्णु ने इसे 'पुरुषोत्तम' नाम दिया, जिससे इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाने लगा।