भानु सप्तमी पर सूर्य चालीसा और आदित्य हृदय स्तोत्र का महत्व
भानु सप्तमी का महत्व
आज रविवार को भानु सप्तमी का विशेष अवसर है, जो भगवान भास्कर को समर्पित है। इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से सभी संकट दूर होते हैं और जातकों को स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। भानु सप्तमी, जिसे रवि सप्तमी भी कहा जाता है, के दिन व्रत करने का महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब कुंडली में सूर्य मजबूत होता है, तो करियर और व्यापार में सफलता मिलती है। इस दिन सूर्य देव की पूजा के साथ सूर्य चालीसा और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना चाहिए, जिससे व्यक्ति की आयु, सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है।
सूर्य चालीसा का पाठ
॥ दोहा ॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्तामाला अङ्ग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥
॥ चौपाई ॥
जय सविता जय जयति दिवाकर! सहस्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु! पतंग! मरीची! भास्कर! सविता हंस! सुनूर विभाकर॥
विवस्वान! आदित्य! विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥
सहस्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि। मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर। हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
मंडल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरन्दर लज्जित होते॥
मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर। सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै। हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं। मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै। दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥
नमस्कार को चमत्कार यह। विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई। अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
बारह नाम उच्चारन करते। सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन। रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है। प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते। रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत। कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित। भास्कर करत सदा मुखको हित॥
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे। रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा। तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर। त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन। भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥
बसत नाभि आदित्य मनोहर। कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा। गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
विवस्वान पद की रखवारी। बाहर बसते नित तम हारी॥
सहस्रांशु सर्वांग सम्हारै। रक्षा कवच विचित्र विचारे॥
अस जोजन अपने मन माहीं। भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं॥
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै। जोजन याको मन मंह जापै॥
अंधकार जग का जो हरता। नव प्रकाश से आनन्द भरता॥
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही। कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥
मंद सदृश सुत जग में जाके। धर्मराज सम अद्भुत बांके॥
धन्यधन्य तुम दिनमनि देवा। किया करत सुरमुनि नर सेवा॥
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों। दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥
परम धन्य सों नर तनधारी। हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन। मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥
भानु उदय बैसाख गिनावै। ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
यम भादों आश्विन हिमरेता। कातिक होत दिवाकर नेता॥
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं। पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं॥
॥ दोहा ॥
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥
आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ
॥ आदित्य हृदय स्तोत्रम् ॥
विनियोग
ॐ अस्य आदित्यहृदय स्तोत्रस्य
अगस्त्यऋषिः अनुष्टुप्छन्दः आदित्यहृदयभूतो।
भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया
ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः॥
ततो युद्धपरिश्रान्तंसमरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वायुद्धाय समुपस्थितम्॥1॥
दैवतैश्च समागम्यद्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्योभगवान् ऋषिः॥2॥
राम राम महाबाहोशृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्ससमरे विजयिष्यसि॥3॥
आदित्यहृदयं पुण्यंसर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यम्अक्षय्यं परमं शिवम्॥4॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यंसर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनम्आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥5॥
रश्मिमंतं समुद्यन्तंदेवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तंभास्करं भुवनेश्वरम्॥6॥
सर्वदेवात्मको ह्येषतेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान्पाति गभस्तिभिः॥7॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्चशिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालोयमः सोमो ह्यपां पतिः॥8॥
पितरो वसवः साध्याह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राणऋतुकर्ता प्रभाकरः॥9॥
आदित्यः सविता सूर्यःखगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेतादिवाकरः॥10॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिःसप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टामार्ताण्ड अंशुमान्॥11॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोभास्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रःशङ्खः शिशिरनाशनः॥12॥
व्योमनाथस्तमोभेदीऋग्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रोविन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥13॥
आतपी मण्डली मृत्युःपिङ्गलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजाःरक्तः सर्वभवोद्भवः॥14॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपोविश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वीद्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥15॥
नमः पूर्वाय गिरयेपश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतयेदिनाधिपतये नमः॥16॥
जयाय जयभद्रायहर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशोआदित्याय नमो नमः॥17॥
नम उग्राय वीरायसारङ्गाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधायमार्ताण्डाय नमो नमः॥18॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशायसूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षायरौद्राय वपुषे नमः॥19॥
तमोघ्नाय हिमघ्नायशत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवायज्योतिषां पतये नमः॥20॥
तप्तचामीकराभायवह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नायरुचये लोकसाक्षिणे॥21॥
नाशयत्येष वै भूतंतदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येषवर्षत्येष गभस्तिभिः॥22॥
एष सुप्तेषु जागर्तिभूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रं चफलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥23॥
वेदाश्च क्रतवश्चैवक्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषुसर्व एष रविः प्रभुः॥24॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषुकान्तातेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषःकश्चिन्नावसीदति राघव॥25॥
पूजयस्वैनमेकाग्रोदेवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वायुद्धेषु विजयिष्यसि॥26॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहोरावणं त्वं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदागस्त्योजगाम च यथागतम्॥27॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजानष्टशोकोऽभवत्तदा।
धारयामास सुप्रीतोराघवः प्रयतात्मवान्॥28॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वातु परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वाधनुरादाय वीर्यवान्॥29॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मायुद्धाय समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वधेतस्य धृतोऽभवत्॥30॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामंमुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वासुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥31॥
॥ इति आदित्यहृदयम् मन्त्रस्य ॥
