ज्येष्ठ माह का पहला बड़ा मंगल: हनुमान चालीसा का पाठ करें और पाएं शुभ फल

आज ज्येष्ठ माह का पहला बड़ा मंगल है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन संकटमोचन हनुमान जी की पूजा करने से जीवन के संकट दूर होते हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करने से मानसिक शांति और सफलता मिलती है। जानें हनुमान चालीसा और आरती के बोल, और इस दिन के महत्व के बारे में।
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ज्येष्ठ माह का पहला बड़ा मंगल: हनुमान चालीसा का पाठ करें और पाएं शुभ फल gyanhigyan

हनुमान चालीसा और आरती के बोल हिंदी में

आज ज्येष्ठ माह का पहला बड़ा मंगल है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। इसे 'बुढ़वा मंगल' के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन संकटमोचन हनुमान जी की पूजा करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और भक्त को शक्ति, ज्ञान और विद्या का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन हनुमान मंदिरों में भक्तों की भीड़ होती है, क्योंकि बजरंगबली के दर्शन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।


हनुमान चालीसा का पाठ करने के लाभ

बड़ा मंगल के अवसर पर हनुमान चालीसा का पाठ करना अत्यंत प्रभावी माना जाता है। यदि आप आज 7 बार हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो शनि और मंगल दोष के नकारात्मक प्रभावों में कमी आती है। इसे 1, 3, 11 या 100 बार भी पढ़ा जा सकता है। हनुमान चालीसा का पाठ मानसिक शांति और हर कार्य में सफलता दिलाने में सहायक होता है। यह अनजाने भय से मुक्ति और बड़े संकटों से राहत भी प्रदान करता है।


हनुमान चालीसा

॥ दोहा ॥


श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि।


बरनउं रघुबर विमल जसु, जो दायकु फल चारि॥


बुद्धिहीन तनु जानिकै, सुमिरौं पवनकुमार।


बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥


॥ चौपाई ॥


जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥


राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनिपुत्र पवनसुत नामा॥


महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥


कंचन बरन बिराज सुवेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा॥


हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥


शंकर सुवन केसरीनन्दन। तेज प्रताप महा जग वन्दन॥


विद्यावान गुणी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥


प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥


सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा। विकट रुप धरि लंक जरावा॥


भीम रुप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे॥


लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुवीर हरषि उर लाये॥


रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥


सहस बदन तुम्हरो यश गावैं। अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥


सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥


जम कुबेर दिकपाल जहां ते। कवि कोबिद कहि सके कहां ते॥


तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥


तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना। लंकेश्वर भये सब जग जाना॥


जुग सहस्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गए अचरज नाहीं॥


दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥


राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥


सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥


आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै॥


भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महावीर जब नाम सुनावै॥


नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥


संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥


सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥


और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फ़ल पावै॥


चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥


साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकन्दन राम दुलारे॥


अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥


राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥


तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥


अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥


और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई॥


संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥


जय जय जय हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नाई॥


जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहिं बंदि महा सुख होई॥


जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥


तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥


॥ दोहा ॥


पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।


राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥


हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥


जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥


अंजनि पुत्र महा बलदाई। सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥


दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥


लंका सो कोट समुद्रसी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥


लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सवारे॥


लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे॥


पैठि पाताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥


बाएं भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥


सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥


कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥


जो हनुमानजी की आरती गावे। बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥


लंका विध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई॥


आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥