करवा चौथ 2026: पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए राहत भरी खबर

करवा चौथ 2026 के अवसर पर पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए राहत भरी खबर है। इस साल किसी भी प्रकार की धार्मिक पाबंदी नहीं है। जानें इस पर्व की विशेषताएँ, चंद्रमा के उदय का समय और पूजा विधि। यह जानकारी आपको इस पावन पर्व को मनाने में मदद करेगी।
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करवा चौथ का पर्व और इसकी विशेषताएँ


विवाह के बाद पहली बार करवा चौथ मनाने वाली महिलाओं के लिए एक सुखद समाचार है। इस वर्ष, पहली बार व्रत रखने पर किसी भी धार्मिक प्रतिबंध का सामना नहीं करना पड़ेगा। ज्योतिष मठ संस्थान के अनुसार, प्राचीन धर्मग्रंथों जैसे धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो पहली बार व्रत रखने पर किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करता हो।


करवा चौथ का समय और चंद्रमा का उदय

पंचांग के अनुसार, इस साल करवा चौथ 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा, और चंद्रमा के उदय का समय रात 8:24 बजे निर्धारित किया गया है। व्रत रखने वाली महिलाओं को चंद्रोदय के समय के साथ-साथ मौसमी बदलावों का भी ध्यान रखना होगा, क्योंकि बादलों और हल्की बारिश के कारण कुछ स्थानों पर चंद्रमा के दर्शन में देरी हो सकती है।


विशेष ज्योतिषीय संयोग

शास्त्रों के अनुसार, जब चंद्रमा क्षितिज से थोड़ा ऊपर उठता है और अपनी प्राकृतिक लालिमा के साथ दिखाई देता है, तभी अर्घ्य देकर पूजा संपन्न करनी चाहिए। इस साल करवा चौथ पर रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र के साथ शिवयोग का अद्भुत संयोग बन रहा है।


ज्योतिषीय दृष्टि से, चंद्रमा का वृषभ राशि में होना वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। यह दुर्लभ खगोलीय संयोग पति-पत्नी के रिश्तों को और मधुर बनाने के लिए इस पर्व को महत्वपूर्ण बनाता है। इसके अलावा, 28 अक्टूबर को शुक्र का उदय होने से करवा चौथ पर शुक्रास्त का कोई दोष नहीं रहेगा और भद्रा की भी कोई बाधा नहीं होगी।


दशरथ चतुर्थी और व्रत की विधि

बंगाल क्षेत्र में इस पर्व को 'दशरथ चतुर्थी' के नाम से भी जाना जाता है। इस बार व्रत की तैयारी कर रही महिलाएं किसी भी भ्रामक जानकारी से दूर रहकर पूरी श्रद्धा से इस पर्व को मना सकती हैं। सोशल मीडिया पर पहली बार व्रत करने वाली महिलाओं के बारे में फैलाई जा रही भ्रांतियाँ निराधार हैं।


व्रत की विधि में, महिलाओं को सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए और सास द्वारा दी गई सरगी ग्रहण करनी चाहिए। इसके बाद माता पार्वती, भगवान शिव और श्री गणेश का स्मरण करते हुए निर्जला या फलाहार व्रत का संकल्प लिया जाता है। संध्या समय पूजा स्थल पर देवी-देवताओं की विधिवत आराधना कर व्रत की कथा पढ़ी या सुनी जाती है। रात्रि में चंद्रमा के निकलने पर छलनी से दर्शन कर चंद्रदेव को जल अर्पित किया जाता है और अंत में पति का चेहरा देखकर व्रत खोला जाता है।