अधिक मासिक दुर्गाष्टमी पूजा विधि: जानें विशेष तिथि और मंत्र
अधिक मासिक दुर्गाष्टमी पूजा का महत्व
अधिक मासिक दुर्गाष्टमी पूजा विधि: 23 मई को अधिक मास की मासिक दुर्गाष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। सनातन धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन सच्चे मन से मां दुर्गा की पूजा करने से जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है और इच्छाएं पूरी होती हैं।
इस दिन मां दुर्गा की पूजा के साथ कुछ विशेष मंत्रों का जाप करने से नकारात्मक ऊर्जा, भय और शत्रुओं का नाश होता है।
अधिक मासिक दुर्गाष्टमी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ अधिक माह की अष्टमी तिथि 23 मई को सुबह 05:04 बजे प्रारंभ होगी और 24 मई को सुबह 04:27 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार, 23 मई को ज्येष्ठ अधिक माह की दुर्गाष्टमी मनाई जाएगी।
अधिक मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा कैसे करें?
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- घर के मंदिर की सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव करें, फिर व्रत का संकल्प लें।
- एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
- मां दुर्गा को कुमकुम, अक्षत, लाल चंदन और लाल चुनरी अर्पित करें।
- दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, साथ ही मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें।
- अंत में मां दुर्गा के समक्ष घी का दीपक जलाएं और आरती करें।
मां दुर्गा को प्रसन्न करने के उपाय
सुहाग की सामग्री अर्पित करें
यदि आप मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो मासिक दुर्गाष्टमी पर उन्हें लाल चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी आदि अर्पित करें। ऐसा करने से वैवाहिक जीवन में सुख और शांति बनी रहती है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ करें
अष्टमी तिथि पर दुर्गा चालीसा का पाठ अवश्य करें। इससे मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और आपकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
मां दुर्गा के मंत्रों का जाप
1. सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।
2. ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।
3. रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभिष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति ॥
4. “दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥”
