134वीं वर्षगांठ: बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह की याद में श्रद्धांजलि
बहाई धर्म के संस्थापक की 134वीं पुण्यतिथि
29 मई, 2026 को बहाई समुदायों ने बहाउल्लाह (ईश्वर की महिमा) की 134वीं पुण्यतिथि मनाई। यह दिन बहाई धर्म के संस्थापक की याद में समर्पित है, जिन्होंने 29 मई, 1892 को अंतिम सांस ली। इस दिन को 'बहाउल्लाह की चढ़ाई' के रूप में मनाया जाता है।
बहाउल्लाह का अंतिम विश्राम स्थल, बहाई धर्म का पवित्र स्थल, इज़राइल के बहजी में स्थित है। यह वह स्थान है जहाँ बहाई अपने अनिवार्य प्रार्थना के दौरान ध्यान लगाते हैं।
यह अवसर बहाई धर्म में एक महत्वपूर्ण पवित्र दिन है, जहाँ लोग 28 मई की रात 11 बजे से विशेष प्रार्थना सेवाएँ आयोजित करते हैं, जो 29 मई की सुबह 3 बजे समाप्त होती हैं, जो उनके निधन का सही समय है।
हर साल यह दिन 13 आजमत के अनुसार मनाया जाता है, जो बहाई कैलेंडर में आता है। बहाई आमतौर पर सुबह से पहले प्रार्थना कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
बहाउल्लाह ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में 40 वर्षों का निर्वासन और कारावास सहा। उनके निधन के बाद, विभिन्न धर्मों के अनुयायी, जैसे मुसलमान, ईसाई, यहूदी और द्रूज़, उनके योगदान की सराहना करते हुए शोक मनाते हैं।

बहाउल्लाह ने मानवता के लिए शांति, लिंग समानता और मानवता की एकता जैसे सिद्धांतों का प्रचार किया। उनके अनुयायी उनके जीवन और शिक्षाओं का सम्मान करते हैं, जो वैश्विक एकता की दिशा में प्रेरित करते हैं।
बहाई धर्म की नींव दो दिव्य संदेशवाहकों—बाब और बहाउल्लाह—के द्वारा रखी गई थी। बहाउल्लाह ने अपने लेखन में एक वैश्विक सभ्यता के विकास का खाका प्रस्तुत किया, जो मानव जीवन के आध्यात्मिक और भौतिक पहलुओं को ध्यान में रखता है।
उनकी शिक्षाएँ आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शन का स्रोत हैं। बहाई धर्म के अनुयायी उनके उत्तराधिकारियों की आधिकारिकता को स्वीकार करते हैं, जो उनके शिक्षाओं के व्याख्याकार हैं।
बहाई धर्म का विकास आज विश्व स्तर पर यूनिवर्सल हाउस ऑफ जस्टिस द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है। यह संगठन मानवता की भलाई, शिक्षा, शांति और वैश्विक समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है।
29 मई, 1892 को बहाउल्लाह का निधन हुआ, और उनके अनुयायी मानते हैं कि उनका आत्मा 'पृथ्वी की सीमाओं से मुक्त होकर एक उच्च क्षेत्र में चढ़ गया।'
यह पवित्र दिन प्रार्थना, शास्त्र पाठ और चिंतन का समय है। इस दिन काम और स्कूल बंद रहते हैं।
बहाउल्लाह का जीवन 40 वर्षों के कारावास और निर्वासन में बीता। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बहजी में बिताए, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली।
बहाई धर्म के अनुयायी इस पवित्र स्थल पर प्रार्थना करने के लिए आते हैं, जो उनके लिए सबसे पवित्र स्थान है।
बहाउल्लाह ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में अपने सबसे बड़े पुत्र 'अब्दुल-बहá' को नियुक्त किया, जो बहाई धर्म के प्रमुख बने।
बहाई धर्म का विकास आज भी विश्व स्तर पर जारी है, और इसके अनुयायी एकता और शांति के लिए कार्यरत हैं।
