अपरा एकादशी: व्रत कथा और भगवान विष्णु की पूजा का महत्व
अपरा एकादशी की कथा
आज 13 मई को अपरा एकादशी का व्रत मनाया जा रहा है। धार्मिक ग्रंथों में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से व्यक्ति को सौ गायों के दान के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है।
भगवान विष्णु की पूजा का महत्व
धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। भक्त इस दिन पीले वस्त्र पहनकर भगवान की पूजा करते हैं। व्रत में कथा सुनना और पढ़ना भी आवश्यक माना गया है।
अपरा एकादशी की पावन कथा
महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन! ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का नाम और उसका महत्व क्या है?”
पापों का नाश
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, “यह पावन एकादशी ‘अपरा एकादशी’ कहलाती है। यह व्रत मनुष्य के पापों का नाश करता है और अपार पुण्य प्रदान करता है। जो श्रद्धा से व्रत करता है, उसे अनेक तीर्थों के पुण्य के समान फल मिलता है।”
आत्मशुद्धि और भगवान की कृपा
भगवान ने बताया कि इस व्रत से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं। चाहे कोई व्यक्ति भूलवश गलत कार्यों में लिप्त हो, इस व्रत के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल सकती है।
पुण्य तीर्थों के समान
भगवान ने कहा, “जो पुण्य मकर संक्रांति पर प्रयाग में स्नान करने से मिलता है, वही पुण्य अपरा एकादशी के व्रत से भी प्राप्त होता है।”
वामन स्वरूप की पूजा
इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा विशेष फलदायी होती है। भक्तों को पीले वस्त्र पहनकर पीले फल, मिठाई और तुलसी अर्पित करना चाहिए। उपवास रखकर विष्णु मंत्रों का जाप करना और रात में भजन करना शुभ माना जाता है।
अन्न का त्याग
युधिष्ठिर ने अगली एकादशी के बारे में पूछा। भगवान ने बताया कि एकादशी के दिन अन्न का त्याग करना चाहिए। द्वादशी तिथि में स्नान के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिए।
श्रद्धा और संयम
भीमसेन ने कहा कि उनके लिए उपवास करना कठिन है। सभी ने उन्हें समझाया कि श्रद्धा और संयम से किया गया व्रत भगवान की कृपा दिलाता है।
