हरिद्वार में कुंभ के दौरान गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की तैयारी

उत्तराखंड सरकार ने हरिद्वार में होने वाले कुंभ और अर्धकुंभ के आयोजन के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय पर विचार करना शुरू किया है। सरकार गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की संभावना पर मंथन कर रही है। यह कदम गंगा घाटों की पवित्रता को बनाए रखने और धार्मिक अनुशासन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक बताया जा रहा है। जानें इस प्रस्ताव के पीछे के कारण और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
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हरिद्वार में कुंभ के दौरान गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की तैयारी

हरिद्वार में कुंभ और अर्धकुंभ के आयोजन की तैयारी

उत्तराखंड सरकार ने हरिद्वार में होने वाले कुंभ और अर्धकुंभ के आयोजन को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय पर विचार करना शुरू किया है। सरकार इस बात पर चर्चा कर रही है कि हरिद्वार के 105 गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाई जाए। यह प्रस्ताव केवल कुंभ के समय तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि भविष्य में एक स्थायी व्यवस्था का रूप भी ले सकता है।


गंगा घाटों की पवित्रता की रक्षा

सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह विचार इसलिए आया है क्योंकि कुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान गंगा घाटों की पवित्रता बार-बार भंग होने की शिकायतें मिलती रही हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अनुशासन की कमी से संत समाज और श्रद्धालुओं में असंतोष उत्पन्न होता है। पुष्कर सिंह धामी सरकार का मानना है कि गंगा घाट केवल स्नान के लिए नहीं हैं, बल्कि ये सनातन आस्था के केंद्र हैं, जहां अनुशासन और धार्मिक मर्यादा का पालन होना चाहिए।


हरिद्वार और ऋषिकेश के घाटों पर नियम लागू करने की योजना

पहले भी हर की पैडी जैसे प्रमुख घाटों पर नगर निगम स्तर पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर नियम लागू रहे हैं। अब सरकार इस व्यवस्था को बढ़ाते हुए हरिद्वार और ऋषिकेश के सभी 105 घाटों पर लागू करने पर विचार कर रही है। इसके साथ ही, हरिद्वार और ऋषिकेश को सनातन पवित्र नगरी घोषित करने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है। सरकार का कहना है कि यह कदम किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि तीर्थ नगरी की पहचान और गंगा की पवित्रता को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।


धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक मर्यादा

उत्तराखंड सरकार का यह प्रस्ताव उन लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने को तैयार रहते हैं। हरिद्वार केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह सनातन चेतना का केंद्र है। जो लोग इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं, वे या तो इतिहास से अनजान हैं या जानबूझकर उसे नजरअंदाज कर रहे हैं। 1916 में हुआ ऐतिहासिक समझौता इस बात का प्रमाण है कि गंगा और हरिद्वार की पवित्रता को लेकर पहले से स्पष्ट दृष्टि थी।


1916 का समझौता और धार्मिक गरिमा

इस समझौते का मुख्य उद्देश्य गंगा के अविरल प्रवाह को बनाए रखना और तीर्थ क्षेत्र की धार्मिक गरिमा की रक्षा करना था। इसमें यह स्पष्ट किया गया था कि गंगा घाट केवल सार्वजनिक स्थल नहीं हैं, बल्कि विशुद्ध धार्मिक क्षेत्र हैं जहां विशेष नियम लागू होंगे। उस समय यह स्वीकार किया गया था कि कुछ धार्मिक स्थलों पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित रहना चाहिए ताकि आस्था और अनुष्ठान निर्विघ्न रह सकें।


धर्मनिरपेक्षता का सही अर्थ

यह कोई नया विचार नहीं है। आज भी देश के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों पर ऐसी व्यवस्थाएं लागू हैं और उन्हें संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। धर्मनिरपेक्षता का सही अर्थ है हर धर्म को उसकी मर्यादा के साथ जीने देना। कुंभ जैसे आयोजन केवल भीड़ प्रबंधन का विषय नहीं हैं, बल्कि यह आध्यात्मिक अनुशासन का महाकुंभ है। यदि वहां अनास्था और अवमानना को खुली छूट दी गई, तो इससे माहौल बिगड़ सकता है।


उत्तराखंड सरकार का साहसिक कदम

उत्तराखंड सरकार का यह कदम सांस्कृतिक साहस का परिचायक है। यह निर्णय दर्शाता है कि राज्य अपनी धार्मिक विरासत को लेकर सजग है और उसे बचाने के लिए कठिन निर्णय लेने से नहीं डरता। यदि यह निर्णय लागू होता है, तो यह केवल उत्तराखंड के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक दिशा-निर्देश बनेगा। गंगा की पवित्रता, हरिद्वार की गरिमा और सनातन परंपरा की रक्षा के लिए यह निर्णय न केवल सही है, बल्कि अनिवार्य भी है। अब समय आ गया है कि राष्ट्र अपनी जड़ों की रक्षा के लिए स्पष्ट और निर्भीक निर्णय करे।