स्क्रीन टाइम का बच्चों के विकास पर प्रभाव: ऑटिज्म का खतरा

एक नए अध्ययन के अनुसार, छोटे बच्चों में लंबे समय तक स्क्रीन देखने से उनके विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लक्षण विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना चाहिए और उन्हें वास्तविक दुनिया के अनुभवों में शामिल करना चाहिए। इस लेख में स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म के बीच संबंध, विशेषज्ञों की सलाह और बच्चों के विकास पर इसके प्रभाव के बारे में जानकारी दी गई है।
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स्क्रीन टाइम और बच्चों का विकास

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के एक अध्ययन और बाल विकास विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे बच्चों, विशेषकर 1 वर्ष से कम उम्र के, यदि वे लंबे समय तक मोबाइल, टीवी या टैबलेट जैसी स्क्रीन का उपयोग करते हैं, तो उनके विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।

स्क्रीन टाइम का बच्चों के विकास पर प्रभाव: ऑटिज्म का खतरा
कम उम्र में अधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर का खतरा, AIIMS अध्ययन में मिला संकेत

कुछ शोधों में यह पाया गया है कि जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम बहुत कम उम्र से अधिक होता है, उनमें 3 साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लक्षण विकसित होने की संभावना अधिक होती है। ASD एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे की बोलने, समझने, बातचीत करने और सामाजिक व्यवहार में भिन्नता देखी जाती है।

हालांकि, विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि स्क्रीन टाइम को सीधे ऑटिज्म का कारण नहीं माना जा सकता। अभी तक यह सिद्ध नहीं हुआ है कि स्क्रीन देखने से ऑटिज्म होता है। लेकिन कई अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि कम उम्र में अधिक स्क्रीन देखने और विकास संबंधी समस्याओं के बीच एक संबंध हो सकता है, जिस पर और शोध जारी है।

डॉक्टरों के अनुसार, छोटे बच्चों का मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है और उन्हें असली दुनिया के अनुभवों की आवश्यकता होती है, जैसे माता-पिता के साथ बातचीत, खेलना, चीजों को छूकर सीखना और लोगों के साथ जुड़ना। अधिक स्क्रीन टाइम से बच्चे इन महत्वपूर्ण अनुभवों से वंचित रह सकते हैं।

इसलिए, विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखा जाए। इस उम्र में मोबाइल या टीवी की बजाय बच्चों से बातचीत करना, उनके साथ खेलना और उन्हें सक्रिय गतिविधियों में शामिल करना अधिक लाभकारी होता है।

ASD, जो मस्तिष्क के विकास से संबंधित एक स्थिति है, की पहचान कई बार 12 से 18 महीने की उम्र में भी की जा सकती है। इसमें बच्चे का सामाजिक व्यवहार, सीखने और बात करने का तरीका भिन्न हो सकता है। इसके लक्षण हर बच्चे में अलग-अलग होते हैं, इसलिए समय पर पहचान और उचित देखभाल अत्यंत आवश्यक है।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया में ऑटिज्म के मामलों में वृद्धि हो रही है, जिससे प्रारंभिक जांच और जागरूकता की आवश्यकता और भी महत्वपूर्ण हो गई है।

AIIMS की प्रोफेसर डॉ. शेफाली गुलाटी के अनुसार, कई अध्ययनों में यह देखा गया है कि जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम जल्दी शुरू होता है और लंबे समय तक चलता है, उनमें विकास संबंधी चुनौतियों और ऑटिज्म से जुड़े लक्षणों का जोखिम अधिक होता है। हालांकि, यह एक संभावित संबंध है, न कि सीधा कारण।

एक अन्य अध्ययन में यह भी पाया गया कि ऑटिज्म वाले बच्चों में स्क्रीन का उपयोग सामान्य बच्चों की तुलना में कम उम्र में शुरू हो चुका था। विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की बजाय बातचीत, खेल और वास्तविक सामाजिक गतिविधियाँ अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये उनके मानसिक, भाषा और सामाजिक विकास में बेहतर सहायता करती हैं।

आजकल “डिजिटल बेबीसिटिंग” यानी बच्चों को बहलाने के लिए मोबाइल या टीवी देना आम हो गया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आदत छोटे बच्चों के विकास के लिए सही नहीं है।

क्या आपका बच्चा ऑटिज्म का शिकार है? समय पर पहचान और उपचार आवश्यक

आपको प्रियंका चोपड़ा का फिल्म 'बर्फी' में निभाया गया 'झिलमिल' का किरदार याद होगा। झिलमिल, जो शारीरिक रूप से बड़ी थी लेकिन मानसिक रूप से छोटे बच्चों की तरह थी, दरअसल ऑटिज्म नामक गंभीर बीमारी से ग्रस्त थी। इस बीमारी से पीड़ित बच्चे का मानसिक विकास रुक जाता है, और वह प्रतिक्रियाएं देने तथा आस-पास के माहौल से जुड़ने में असमर्थ होता है।