सोनम वांगचुक ने आरोपों का किया खंडन, सुप्रीम कोर्ट ने दी मेडिकल जांच का आदेश
सोनम वांगचुक का बयान और कानूनी स्थिति
कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने उन आरोपों का खंडन किया है कि उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि यदि लद्दाख के निवासियों की मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे युद्ध के समय भारतीय सेना की सहायता नहीं करेंगे। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और पी बी वराले की पीठ के समक्ष यह दलील दी। यह सुनवाई राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत उनकी हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर हो रही थी। न्यायमूर्ति कुमार ने सिबल से कहा कि हिरासत में लेने वाले अधिकारियों ने एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिए गए उनके साक्षात्कार का हवाला दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि "किसी भी क्षेत्र को जनमत संग्रह के लिए जाने की छूट है और यदि राज्य का दर्जा देने की मांग पूरी नहीं की जाती, तो लद्दाख के लोग युद्धकाल में भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे।"
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सोनम वांगचुक की विशेषज्ञ डॉक्टर से मेडिकल जांच कराने का आदेश दिया है। वांगचुक ने पानी की खराब गुणवत्ता के कारण पेट से संबंधित समस्याओं की शिकायत की थी। 59 वर्षीय वांगचुक वर्तमान में जोधपुर सेंट्रल जेल में हैं। जस्टिस अरविंद कुमार की अगुवाई वाली बेंच ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट सोमवार तक सीलबंद लिफाफे में अदालत में पेश की जाए। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने अदालत को बताया कि उन्हें साप्ताहिक जांच की सुविधा दी जाए और जो पानी वे उपलब्ध कराते हैं, वही उन्हें दिया जाए। इस पर राजस्थान सरकार के वकील ने कहा कि पिछले चार महीनों में जेल डॉक्टर उनकी 21 बार जांच कर चुके हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टर की आवश्यकता
इसके बावजूद, शीर्ष अदालत ने कहा कि वांगचुक को गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट जैसे किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की जांच की आवश्यकता है। राजस्थान सरकार के वकील ने अदालत को यह भी बताया कि वांगचुक को विटामिन बी12 लेने की सलाह दी गई है और उनकी ताज़ा मेडिकल रिपोर्ट में कोई गंभीर समस्या नहीं पाई गई है। वहीं, सोनम वांगचुक ने उन आरोपों का खंडन किया कि उन्होंने 'अरब स्प्रिंग' की तरह सरकार को उखाड़ फेंकने वाला बयान दिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ के समक्ष यह तर्क दिया कि पुलिस ने हिरासत में भेजने वाले प्राधिकारी को गुमराह करने के लिए चुनिंदा वीडियो का सहारा लिया है।
