सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की हिरासत पर सुनवाई, NSA के तहत चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। उनकी पत्नी द्वारा दायर इस याचिका में वांगचुक की हिरासत के आधारों पर सवाल उठाए गए हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि हिरासत का आदेश कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं करता। वांगचुक के खिलाफ कार्रवाई के संदर्भ में भी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की गई। जानें इस मामले की पूरी जानकारी।
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सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की हिरासत पर सुनवाई, NSA के तहत चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में लद्दाख से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामले पर विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को चुनौती दी गई। यह याचिका उनकी पत्नी, डॉ. गीताांजलि अंगमो द्वारा दायर की गई है। जानकारी के अनुसार, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना वराले की पीठ ने पूरे दिन के दूसरे सत्र में मामले की सुनवाई की, जिसमें याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें प्रस्तुत कीं।


वांगचुक की हिरासत का मामला

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को लद्दाख में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद NSA के तहत हिरासत में लिया गया था। सरकार का आरोप है कि इन प्रदर्शनों के दौरान स्थिति हिंसक हो गई थी, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई। हालांकि, सिब्बल ने अदालत में कहा कि हिरासत का आदेश जिन चार वीडियो पर आधारित है, वे न तो समय पर और न ही पूरी तरह से वांगचुक को उपलब्ध कराए गए। उनके अनुसार, कानून स्पष्ट है कि यदि हिरासत के आधार बताए जाएं लेकिन उन पर निर्भर दस्तावेज न दिए जाएं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 22 का उल्लंघन है।


हिरासत के आधार पर सवाल

सिब्बल ने यह भी बताया कि हिरासत के आधार 29 सितंबर को दिए गए, जबकि वीडियो न तो पेन ड्राइव में थे और न ही उनकी प्रतियां दी गईं। बाद में केवल वीडियो के लिंक दिए गए, जो प्रभावी बचाव का अधिकार नहीं माने जा सकते। उन्होंने कहा कि वांगचुक ने हिरासत से कई बार पत्र लिखकर इन वीडियो की मांग की, लेकिन उन्हें कभी उपलब्ध नहीं कराया गया। यहां तक कि उनकी पत्नी को भी संबंधित दस्तावेज देने का आश्वासन देकर इंतजार कराया गया, लेकिन कुछ नहीं दिया गया।


कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन

सिब्बल ने अदालत को बताया कि हिरासत के आधार देने में 28 दिनों की देरी हुई, जो कानूनन तय समयसीमा का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि हिरासत का उद्देश्य व्यक्ति को प्रभावी प्रतिनिधित्व से वंचित करना नहीं हो सकता। यदि सलाहकार बोर्ड की बैठक से ठीक पहले दस्तावेज दिए जाएं, तो यह केवल औपचारिकता रह जाती है, जबकि संविधान वास्तविक और सार्थक अवसर की बात करता है।


वांगचुक का अहिंसक आंदोलन

सिब्बल ने हिरासत के मूल आरोपों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि वांगचुक 11 सितंबर से भूख हड़ताल पर थे और जब 24 सितंबर को कुछ स्थानों पर हिंसा हुई, तो उन्होंने अपनी भूख हड़ताल तोड़कर सार्वजनिक रूप से हिंसा खत्म करने की अपील की। सिब्बल ने इस भाषण की तुलना महात्मा गांधी द्वारा चौरी-चौरा की घटना के बाद आंदोलन रोकने के फैसले से की। अदालत की अनुमति से यह वीडियो कोर्ट में चलाया गया, जिसमें वांगचुक हिंसा के खिलाफ स्पष्ट संदेश देते नजर आए।


संविधान का उल्लंघन

सिब्बल का तर्क था कि जिस भाषण में हिंसा रोकने की बात कही गई, उसे नजरअंदाज कर केवल चुनिंदा सामग्री के आधार पर हिरासत का आदेश पारित किया गया, जो दुर्भावनापूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन अहिंसक सत्याग्रह के विचार पर आधारित था और खुद वांगचुक ने कई बार स्पष्ट किया कि यह संघर्ष पत्थर या हथियार से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण तरीकों से होगा।


वांगचुक के खिलाफ कार्रवाई का संदर्भ

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि वांगचुक के खिलाफ कार्रवाई अचानक अगस्त-सितंबर 2025 में शुरू हुई, जिसके बाद उनसे जुड़े संस्थानों पर जांच, नोटिस और अन्य दबाव बनाए गए। सिब्बल ने इसे व्यापक पृष्ठभूमि में देखा जाने वाला मामला बताया और कहा कि हिरासत का आदेश कानूनी प्रक्रियाओं और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना जारी किया गया है, इसलिए यह टिकाऊ नहीं है और रद्द किए जाने योग्य है।