सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर पर महिलाओं के प्रवेश का मामला: अंतिम सुनवाई शुरू

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई शुरू की है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में नौ जजों की बेंच ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। 2018 के फैसले से जुड़ा यह मामला महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित है। केंद्र सरकार ने तर्क दिया है कि सभी संवैधानिक प्रश्नों को लिंग के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। जानें इस मामले में क्या हो रहा है और सरकार का क्या कहना है।
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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर पर महिलाओं के प्रवेश का मामला: अंतिम सुनवाई शुरू

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का प्रारंभ

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने 7 अप्रैल से सबरीमाला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू की। इस संविधान पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं। यह मामला 2018 के उस निर्णय से संबंधित है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी और इस प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था। 2019 में, एक अलग पांच जजों की बेंच ने महिलाओं के प्रवेश और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक प्रश्नों को विचार के लिए एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। केंद्र और केरल सरकार ने 2018 के फैसले की समीक्षा की याचिकाओं का समर्थन किया है। 


धार्मिक प्रथाओं का सम्मान

सभी धार्मिक प्रथाएं गरिमा या व्यक्तिगत पसंद से जुड़ी नहीं होतीं

मुख्य न्यायाधीश तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सभी धार्मिक प्रथाओं को गरिमा या व्यक्तिगत पसंद के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने अन्य धर्मों के उदाहरण देते हुए कहा कि हमें हर धार्मिक प्रथा का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से संबंधित नहीं होती। उन्होंने आगे कहा कि यदि मैं किसी मजार या गुरुद्वारे में जाता हूं और मुझे अपना सिर ढकना पड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद छीन ली गई है। मेहता ने तर्क किया कि सबरीमाला का मुद्दा स्वयं देवता के स्वरूप से जुड़ा है और इसकी न्यायिक जांच कैसे की जा सकती है, इस पर सवाल उठाया।


सरकार का दृष्टिकोण

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हर मुद्दा लिंग आधारित नहीं होता

केंद्र सरकार की ओर से बहस करते हुए, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सभी संवैधानिक प्रश्नों को लिंग के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के विवादास्पद मामले का बचाव किया। मेहता ने संविधान पीठ के समक्ष कहा कि पिछले एक दशक में, एक ऐसी न्यायशास्त्र विकसित हुई है जिसमें हर संवैधानिक प्रावधान को लिंग के नजरिए से देखने की कोशिश की जाती है। लेकिन सभी प्रावधानों का ऐसा उद्देश्य नहीं है। उन्होंने तर्क किया कि इस मामले में कोई भेदभाव नहीं है, और समानता की संवैधानिक गारंटी का हवाला दिया। अनुच्छेद 14 सभी को समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15 लिंग सहित अन्य आधारों पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। मौलिक अधिकार सभी को समान रूप से प्राप्त हैं।


धार्मिक प्रथाओं की पहचान

केंद्र ने धार्मिक मामलों में अपनी सीमाएं बताईं

अपने तर्कों को जारी रखते हुए, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाया कि क्या अदालतों के पास यह निर्धारित करने की विशेषज्ञता है कि आवश्यक धार्मिक प्रथा क्या है। मेहता ने कहा कि आवश्यक प्रथाओं की पहचान के लिए धार्मिक ग्रंथों और विकसित हो रही विश्वास प्रणालियों का गहन अध्ययन आवश्यक होगा। उन्होंने पूछा, अदालत इसकी अनिवार्यता की जांच कैसे कर सकती है? संस्थागत सीमाओं पर चिंता जताते हुए मेहता ने कहा, "इस अदालत को कई बातों पर फैसला करना होगा - मुद्दा यह है कि क्या अदालत के पास इस विषय की विशेषज्ञता है?" उन्होंने धर्मों की विविधता की ओर इशारा किया, जिसमें कई संप्रदाय और उप-संप्रदाय शामिल हैं, और एक अधिक संरचित दृष्टिकोण का सुझाव दिया। हमें यह जांचने की आवश्यकता हो सकती है कि प्रथा क्या है और फिर क्या यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।