सुप्रीम कोर्ट में यूएपीए मामलों में जमानत पर बहस: क्या आतंकवाद के मामलों में भी जमानत नियम है?

सुप्रीम कोर्ट में यूएपीए के तहत मामलों में जमानत पर चल रही बहस ने एक महत्वपूर्ण मोड़ लिया है। क्या आतंकवाद से जुड़े मामलों में 'जमानत नियम है और जेल अपवाद' का सिद्धांत लागू होगा? केंद्र सरकार ने इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की है। सुनवाई के दौरान, अदालत ने जमानत याचिकाओं के साथ-साथ इस प्रश्न पर भी निर्णय सुरक्षित रखा है। जानें इस जटिल कानूनी मुद्दे के विभिन्न पहलुओं के बारे में और कैसे यह भविष्य में जमानत के मामलों को प्रभावित कर सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट में जमानत के मुद्दे पर गंभीर चर्चा

सुप्रीम कोर्ट में गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम, जिसे यूएपीए के नाम से जाना जाता है, के तहत मामलों में जमानत के संबंध में विभिन्न पीठों के निर्णयों के बीच यह सवाल उठता है कि क्या आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी "जमानत नियम है और जेल अपवाद" का सिद्धांत लागू होगा। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने 2020 के दिल्ली दंगा मामले के आरोपियों तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान, अदालत ने जमानत याचिकाओं के साथ-साथ इस प्रश्न पर भी निर्णय सुरक्षित रखा कि क्या इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि आदेश बाद में या 25 मई को सुनाया जा सकता है।


दिल्ली पुलिस की दलीलें

दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने अदालत में कहा कि जमानत का निर्णय हर मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि केवल लंबे समय तक जेल में रहने को आधार मान लिया जाए, तो गंभीर आतंकवादी मामलों में भी जमानत दी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, उन्होंने 26 नवंबर 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले के दोषी अजमल कसाब का उल्लेख किया, यह पूछते हुए कि क्या उसे भी जमानत मिलती यदि वह कई वर्षों तक मुकदमे के कारण जेल में रहता। इसी तरह, उन्होंने लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का उदाहरण दिया, यह बताते हुए कि यदि साक्ष्य जुटाने में समय लगे, तो क्या केवल पांच साल जेल में रहने के कारण उसे रिहा किया जाएगा।


हालिया फैसले का प्रभाव

राजू ने अदालत को बताया कि हाल के निर्णय में अपराध की प्रकृति और आरोपित की भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने याद दिलाया कि दिल्ली दंगों में 53 लोगों की जान गई थी और ऐसे मामलों में सामान्य आपराधिक मामलों जैसा दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता। उनका कहना था कि अदालत को हर मामले की गंभीरता, आरोपित की भूमिका, मुकदमे की स्थिति और देरी के कारणों को ध्यान में रखना चाहिए।


18 मई का महत्वपूर्ण निर्णय

यह विवाद 18 मई को आए एक निर्णय के बाद और बढ़ गया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा जांचे जा रहे एक यूएपीए मामले में आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए दो अन्य पीठों के पुराने फैसलों से असहमति जताई थी। अदालत ने कहा कि "जमानत नियम है और जेल अपवाद" भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से निकला एक मूल सिद्धांत है।


अतीत के फैसलों पर सवाल

इस फैसले में अदालत ने फरवरी 2024 के गुरविंदर सिंह मामले और जनवरी 2026 के गुलफिशा फातिमा मामले में दिए गए आदेशों पर सवाल उठाया था। गुरविंदर सिंह मामला एक अलगाववादी गतिविधि से जुड़ा था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि आरोप पहली नजर में सही प्रतीत होते हैं, तो जमानत अपवाद हो सकती है। वहीं, गुलफिशा फातिमा मामले में अदालत ने दिल्ली दंगा साजिश मामले के पांच आरोपितों को जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत देने से इंकार कर दिया था।


संविधान की भावना और जमानत

गुलफिशा फातिमा मामले में अदालत ने यह भी कहा था कि केवल लंबे समय तक जेल में रहना अपने आप में जमानत पाने का अधिकार नहीं बन सकता, विशेषकर आतंकवाद से जुड़े मामलों में। हालांकि, 18 मई के फैसले में न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि पुराने फैसलों का उपयोग यूएपीए के तहत आरोपितों को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता।


व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक सुरक्षा

इस बहस के केंद्र में वर्ष 2021 का यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब मामला भी है, जिसमें कहा गया था कि यदि त्वरित सुनवाई का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा हो, तो यूएपीए जैसे कठोर कानून में भी जमानत दी जा सकती है। यह मामला केरल के चर्चित प्रोफेसर हाथ काटने की घटना से जुड़ा था, जिसमें आरोपी वर्ष 2015 से जेल में था।


भविष्य की दिशा

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। केंद्र सरकार का कहना है कि केवल मुकदमे में देरी को आधार बनाकर जमानत देना उचित नहीं होगा, जबकि दूसरी ओर अदालत के कुछ फैसले यह स्पष्ट कर रहे हैं कि किसी भी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संविधान की भावना के विपरीत है। ऐसे में बड़ी पीठ का संभावित फैसला भविष्य में यूएपीए मामलों में जमानत की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।