सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर महत्वपूर्ण सुनवाई के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रखा है। इस मामले में केंद्र सरकार ने मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध बनाए रखने की मांग की है। 2018 में आए एक ऐतिहासिक फैसले के बाद से यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। अदालत ने अन्य धार्मिक परंपराओं पर भी सुनवाई की और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर विस्तृत चर्चा की। अब सभी की नजर इस फैसले पर है, जो महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।
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महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर महत्वपूर्ण सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामले पर अपना निर्णय सुरक्षित रखा है। लगभग 16 दिनों तक चली सुनवाई में अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि संविधान के अंतर्गत धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के समान अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है। इस दौरान केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध बनाए रखने की मांग की। सरकार का तर्क था कि यह मामला धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता से संबंधित है।


2018 का ऐतिहासिक फैसला

वास्तव में, सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक मानते हुए हटा दिया था। इस निर्णय के बाद देशभर में व्यापक बहस और विरोध प्रदर्शन हुए। इसके बाद, 2019 में इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा गया ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार किया जा सके।


अन्य धार्मिक परंपराओं पर भी सुनवाई

सबरीमाला मामले के साथ-साथ अदालत ने मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश, और गैर-पारसी पुरुषों से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश जैसे मुद्दों पर भी सुनवाई की। अदालत के समक्ष यह प्रश्न भी था कि क्या धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम निर्धारित करने का पूरा अधिकार है या वे संविधान के समानता और मौलिक अधिकारों के दायरे में आते हैं।


संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर चर्चा

सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर विस्तृत चर्चा हुई। अदालत ने यह समझने का प्रयास किया कि व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों की सीमाएं क्या हैं। पीठ ने यह भी पूछा कि क्या धार्मिक प्रथाएं अन्य मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं। अब देश की नजर सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय पर है, जो धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों के संबंध में भविष्य की संवैधानिक दिशा तय कर सकता है।