सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम के सभी पदों के अनिवार्य गायन पर केंद्र से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को वंदे मातरम के सभी पदों के अनिवार्य गायन के आदेशों पर जवाब देने का निर्देश दिया है। यह मामला दो याचिकाओं से संबंधित है, जिनमें इन आदेशों को असंवैधानिक बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वंदे मातरम के पहले दो पद धार्मिक संदर्भ नहीं देते हैं। अगली सुनवाई 30 नवंबर को होगी।
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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश


नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को दो अलग-अलग याचिकाओं पर अपना उत्तर प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। इन याचिकाओं में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी उन निर्देशों को चुनौती दी गई है, जिनके अनुसार औपचारिक सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के सभी छह पदों का गाना अनिवार्य कर दिया गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इन याचिकाओं की सुनवाई करते हुए गृह मंत्रालय को नोटिस जारी किया है।


याचिकाओं का विवरण

यह मामला गृह मंत्रालय द्वारा जनवरी और जुलाई 2026 में जारी किए गए दो अलग-अलग सरकारी आदेशों से संबंधित है। नागपुर के बौद्ध कार्यकर्ता बीडी बोरकर और पूर्व आईएएस अधिकारी बालकृष्णन सत्यभामा मावोजी ने इन आदेशों को असंवैधानिक और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है। याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखे गए वंदे मातरम के पहले दो पद किसी धार्मिक संदर्भ का उल्लेख नहीं करते हैं और केवल प्रकृति की प्रशंसा करते हैं, जिसे पिछले 79 वर्षों से राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता प्राप्त है।


धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन

हालांकि, बंकिम चंद्र के उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल तीसरे से छठे पद में कुछ विशेष धार्मिक तत्व शामिल हैं, जिन्हें नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन मानते हुए थोपना अनुचित है। पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मावोजी ने अपनी याचिका में कहा कि भारत के संविधान में निहित बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता और विचार एवं धर्म की स्वतंत्रता के तहत वंदे मातरम के सभी छह पदों को अनिवार्य बनाना गलत है। उन्होंने गृह मंत्रालय के दोनों आदेशों को रद्द करने की मांग की है और केवल दो पदों वाले वंदे मातरम को आधिकारिक मान्यता देने की अपील की है।


अगली सुनवाई की तिथि

कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा ने भी इस मामले में 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम' में संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को सूचीबद्ध करते हुए मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर को निर्धारित की है।