सुप्रीम कोर्ट ने पोर्नोग्राफी पर रोक लगाने की याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें सार्वजनिक स्थलों पर पोर्नोग्राफी पर रोक लगाने के लिए एक ढांचा तैयार करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह मामला नीति से संबंधित है और याचिकाकर्ता को सरकारी अधिकारियों के पास अपनी बात रखने की सलाह दी। जानें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोर्ट का क्या कहना था और याचिका में क्या दलीलें दी गई थीं।
| Jul 13, 2026, 19:02 IST
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सोमवार को, सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार से सार्वजनिक स्थलों पर पोर्नोग्राफी पर रोक लगाने के लिए एक ढांचा तैयार करने की मांग की गई थी। न्यायालय ने कहा कि यह मामला नीति से संबंधित है और याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे अपनी बात सरकारी अधिकारियों के समक्ष रखें। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा वी मोहना की बेंच ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें ऐसा कोई कानूनी प्रश्न नहीं है जिस पर अदालत को विचार करने की आवश्यकता हो। याचिका में यह मांग की गई थी कि विशेष रूप से नाबालिगों के लिए एक राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना बनाई जाए, साथ ही सार्वजनिक स्थलों पर किसी भी प्रकार के पोर्नोग्राफिक सामग्री को देखने पर रोक लगाने की भी अपील की गई थी।
मामले की गंभीरता
बेंच ने कहा कि उठाया गया मुद्दा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस मामले में कोई कानूनी प्रश्न नहीं है जिस पर विचार करने की आवश्यकता हो। यह एक नीति से संबंधित मामला है, जिसके लिए तकनीकी प्रगति और विशेषज्ञों की राय की आवश्यकता है। ऐसे मामलों का संबंध विशेषज्ञों, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से है। सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता बीएल जैन की याचिका पर सुनवाई की, जिसमें वकील वरुण ठाकुर ने उनका प्रतिनिधित्व किया। याचिका में कहा गया कि इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी के आंकड़े चिंताजनक हैं; हर सेकंड 5,000 पोर्न साइट्स देखी जाती हैं। इंटरनेट के माध्यम से 2 करोड़ से अधिक पोर्न वीडियो/क्लिप्स उपलब्ध हैं।
कानूनी तर्क
याचिका में कानून का हवाला देते हुए कहा गया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 A के तहत, प्रतिवादियों को किसी भी कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से जनता की पहुंच को रोकने के लिए निर्देश जारी करने का अधिकार है। इसमें यह भी तर्क किया गया कि इंटरनेट की व्यापक उपलब्धता ने पोर्नोग्राफिक सामग्री को आसानी से उपलब्ध करा दिया है, जिससे इसका अत्यधिक सेवन और लत लग गई है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि ऐसे कंटेंट के बढ़ते सेवन ने यौन अपराधों को बढ़ावा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा कि इस मामले को सरकार के समक्ष उठाया जाना चाहिए, जबकि याचिका में एक राष्ट्रीय नीति, एक कार्य योजना और सार्वजनिक स्थलों पर पोर्नोग्राफी पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने की मांग की गई थी।
