सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के आरोपियों को जमानत देने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
दिल्ली दंगों के संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि इन दोनों आरोपियों की भूमिका अन्य सह-आरोपियों की तुलना में "अलग और गंभीर" है। हालांकि, कोर्ट ने पांच अन्य आरोपियों को जमानत प्रदान की, जिससे इस संवेदनशील मामले में कुछ राहत मिली है, जो पिछले चार वर्षों से चर्चा में है।
जमानत याचिकाओं पर कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि ट्रायल में देरी को जमानत का आधार नहीं माना जा सकता। शरजील इमाम को भी जमानत नहीं दी गई। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत का मतलब यह नहीं है कि आरोपों में कोई कमी आई है। इस बीच, अन्य आरोपियों जैसे गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद समीर खान, शादाब अहमद और शिफा उर रहमान को जमानत मिल गई।
जमानत की शर्तें
कोर्ट ने बताया कि जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपों में कोई कमी आई है। जमानत पर रिहाई के लिए लगभग 12 शर्तें निर्धारित की गई हैं। यदि इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट आरोपी की जमानत रद्द कर सकता है। अदालत ने मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि और अभियोजन पक्ष के बयानों पर ध्यान दिया।
अभियोजन में देरी का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने कानून और संविधान के बीच अमूर्त तुलना नहीं की है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अभियोजन में देरी को सजा के रूप में नहीं देखा जा सकता है। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में, देरी को "ट्रंप कार्ड" के रूप में नहीं लिया जा सकता। जमानत पर विचार करते समय, प्रत्येक आरोपी की भूमिका का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।
बेल पाने वाले आरोपियों की सूची
जिन पांच आरोपियों को जमानत मिली है, उनके नाम हैं: गुलफिशा फातिमा, मेरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान, और शादाब अहमद।
दिल्ली दंगों का संदर्भ
उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और IPC की धाराओं के तहत फरवरी 2020 के दंगों का "मास्टरमाइंड" होने का आरोप है। इस हिंसा में 53 लोगों की जान गई और 700 से अधिक लोग घायल हुए। यह दंगे नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़के थे।
