सुप्रीम कोर्ट की बढ़ती चुनौतियाँ: 92,000 से अधिक लंबित मामले

भारत के सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92,251 तक पहुँच गई है, और यह आंकड़ा 2026 में एक लाख तक पहुँचने की संभावना है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के बावजूद, नए मामलों की संख्या निपटाने की दर से अधिक है। सीजेआई सूर्यकांत ने मध्यस्थता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया है, जबकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे एक व्यावहारिक समाधान बताया है। जानें इस स्थिति के पीछे के कारण और संभावित समाधान।
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सुप्रीम कोर्ट की बढ़ती चुनौतियाँ: 92,000 से अधिक लंबित मामले

सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या में वृद्धि

सुप्रीम कोर्ट की बढ़ती चुनौतियाँ: 92,000 से अधिक लंबित मामले

सुप्रीम कोर्ट CJI सूर्यकांत.

भारत की सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष के अंत तक, लंबित मामलों की संख्या 92,251 तक पहुँच गई। अनुमान है कि 2026 में यह आंकड़ा एक लाख तक पहुँच सकता है। सितंबर 2022 में यह संख्या 88,417 थी, जिसमें 69,553 दीवानी और 18,864 आपराधिक मामले शामिल थे।

राष्ट्रीय डेटा ग्रिड के अनुसार, 31 दिसंबर को 92,000 से अधिक लंबित मामले अब तक का सबसे अधिक आंकड़ा है, जो मामलों की बढ़ती संख्या को दर्शाता है। 2014 में यह संख्या 63,000 थी और 2023 के अंत तक लगभग 80,000 तक पहुँच गई। यह स्थिति न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के बावजूद बनी हुई है, क्योंकि नए मामलों की संख्या निपटाने की दर से अधिक है।


2025 में मामलों का निपटारा

2025 में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा किया। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 75,000 से ज्यादा मामले निपटाए हैं, जबकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हर साल दर्ज मामलों में से केवल 70 से 80 मामलों पर बहस होती है। ब्रिटेन में, पिछले साल 29 दिसंबर तक केवल 200 से अधिक मामले आए और लगभग 50 मामलों में ही निर्णय सुनाया गया। इसके विपरीत, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 1,400 महत्वपूर्ण फैसले सुनाए और हजारों आदेश जारी किए।


मध्यस्थता का महत्व

मध्यस्थता से लंबित मामलों में कमी

सीजेआई सूर्यकांत ने हाल ही में बढ़ती मुकदमों की संख्या के संदर्भ में मध्यस्थता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी स्तरों पर मध्यस्थों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। मध्यस्थता, जो न्यायिक मामलों के लंबित होने को कम कर सकती है, कानून की कमजोरी का संकेत नहीं है, बल्कि इसका उच्चतम विकास है।


सॉलिसिटर जनरल का समर्थन

मध्यस्थता का समर्थन

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि देश में मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नए और व्यावहारिक समाधान की आवश्यकता है। उनके अनुसार, मध्यस्थता एक सही तरीका हो सकता है, जिससे पक्षकारों को आपसी सहमति पर आने का अवसर मिलता है। कई कानूनविद् भी तुषार मेहता के विचारों का समर्थन करते हैं ताकि न्यायपालिका पर बोझ कम हो सके।


जजों की संख्या की कमी

10 लाख की जनसंख्या पर केवल 21 जज

भारतीय न्यायपालिका में, प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर केवल 21 जज हैं, जो दुनिया में सबसे कम है। अमेरिका में इतनी ही जनसंख्या पर 150 जज कार्यरत हैं। विधि आयोग की 1987 में प्रकाशित रिपोर्ट में प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर 50 जजों की सिफारिश की गई थी, जो अमेरिका के मुकाबले मात्र एक-तिहाई है। यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट में भी है, और फिर भी जितने मामलों का समाधान एक साल में हुआ है, वह अमेरिका और ब्रिटिश न्यायपालिका के लिए सोच पाना भी नामुमकिन है।