सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: भाषणों पर एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता नहीं
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसके बाद इस पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिए गए भाषणों के आधार पर एफआईआर दर्ज करने का कोई संघीय अपराध नहीं बनता है। हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के भाषणों में नफरत फैलाने का तत्व है। कोर्ट ने इस मामले में अपने निर्णय में कहा कि यह कोई संघीय अपराध नहीं है, अर्थात् यह कॉग्निजबल ऑफेंस नहीं है। कॉग्निजबल अपराध वह होता है जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है और बिना न्यायालय की अनुमति के जांच शुरू कर सकती है। लेकिन कोर्ट ने इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया।
याचिका और सुनवाई
सीपीएम नेताओं वृंदा करात और के एम तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि भाजपा नेताओं की टिप्पणियों से सांप्रदायिक हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था नहीं भड़की। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें कथित भाषण और निचली अदालत के समक्ष प्रस्तुत स्थिति रिपोर्ट शामिल हैं, पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद, यह निष्कर्ष निकाला कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। यह विवाद जनवरी 2020 में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों से जुड़ा है।
एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने पहले दिल्ली पुलिस आयुक्त और पार्लियामेंट स्ट्रीट एसएचओ से संपर्क कर दोनों नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया था। जब पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने राउज़ एवेन्यू अदालत में याचिका दायर की। निचली अदालत ने 26 अगस्त, 2020 को उनकी शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सक्षम प्राधिकारी से नामजद आरोपियों पर मुकदमा चलाने की पूर्व अनुमति के अभाव में यह कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।
उच्च न्यायालय का निर्णय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने करात और तिवारी की याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें भाजपा के नेताओं के खिलाफ घृणास्पद भाषण के आरोप में एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी। न्यायालय ने कहा कि ये बयान किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं थे और न ही इनसे हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था भड़काने का कोई संकेत मिला। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के अंतर्गत आने वाले अपराधों के संबंध में, एफआईआर दर्ज करने और जांच का निर्देश देने की शक्ति का प्रयोग पूर्व स्वीकृति के अभाव में नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की असहमति
हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने निचली अदालत और उच्च न्यायालय के इस तर्क से असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता केवल मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के चरण में उत्पन्न होती है। दंड प्रक्रिया संहिता की योजना में संज्ञान लेने से पहले एफआईआर दर्ज करने या जांच करने के निर्देश पर कोई रोक नहीं है। पीठ ने कहा कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया क्रमबद्ध है। सबसे पहले संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्त होनी चाहिए, फिर एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए, उसके बाद जांच होनी चाहिए।
