सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: EPFO वेतन सीमा में बदलाव की आवश्यकता

सुप्रीम कोर्ट ने EPFO योजना में वेतन सीमा के संशोधन के लिए केंद्र सरकार को चार महीने का समय दिया है। पिछले 11 वर्षों से यह सीमा अपरिवर्तित है, जिससे कई कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा से वंचित रह गए हैं। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि पिछले 70 वर्षों में वेतन सीमा का पुनरीक्षण मनमाने ढंग से किया गया है। जानें इस महत्वपूर्ण निर्णय के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित प्रभाव।
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: EPFO वेतन सीमा में बदलाव की आवश्यकता

EPFO वेतन सीमा में बदलाव का आदेश

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: EPFO वेतन सीमा में बदलाव की आवश्यकता

EPFO सैलरी पर बड़ा अपडेट

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्र सरकार को ‘कर्मचारी भविष्य निधि’ (ईपीएफ) योजना में वेतन सीमा के संशोधन पर चार महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह सीमा पिछले 11 वर्षों से अपरिवर्तित है। न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल की याचिका पर सुनाया।

याचिका में कहा गया है कि ‘कर्मचारी भविष्य निधि संगठन’ (ईपीएफओ) इस योजना में 15,000 रुपये से अधिक की मासिक आय वाले कर्मचारियों को शामिल नहीं करता है।

70 वर्षों से वेतन में बदलाव की अनियमितता

याचिकाकर्ता के वकील प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने तर्क दिया कि देश के कई क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन इस सीमा से अधिक हो जाने के बावजूद ईपीएफ की वेतन सीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे बड़ी संख्या में कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा और भविष्य निधि के लाभ से वंचित रह गए हैं। शीर्ष अदालत ने याचिका का निपटान करते हुए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर आदेश की प्रति के साथ केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिवेदन रखें। सरकार को चार महीने के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा। याचिका में यह भी कहा गया कि पिछले 70 वर्षों में वेतन सीमा का पुनरीक्षण मनमाने ढंग से किया गया है, और कभी-कभी तो यह 13-14 साल के अंतराल के बाद हुआ है। इस दौरान मुद्रास्फीति, न्यूनतम वेतन या प्रति व्यक्ति आय जैसे आर्थिक संकेतकों का ध्यान नहीं रखा गया।

कम कर्मचारियों को मिल रहा लाभ

याचिका के अनुसार, ‘इस असंगत नीति के कारण ईपीएफ योजना के तहत पहले की तुलना में आज बहुत कम कर्मचारियों को इसका लाभ मिल रहा है। वर्ष 2022 में ईपीएफओ की उप-समिति ने वेतन सीमा बढ़ाने और अधिक कर्मचारियों को योजना में शामिल करने की सिफारिश की थी, जिसे केंद्रीय बोर्ड ने भी मंजूरी दी थी। लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक इस पर निर्णय नहीं लिया है। याचिका में कहा गया है कि पिछले 70 वर्षों में ईपीएफ योजना की वेतन सीमा में हुए संशोधन के विश्लेषण से पता चलता है कि शुरुआती 30 वर्षों में यह एक समावेशी ढांचे के रूप में थी, लेकिन पिछले तीन दशकों में यह स्पष्ट रूप से अधिक कर्मचारियों को बाहर रखने का जरिया बन गई है।

(इनपुट – भाषा)