सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वैवाहिक जीवन में चुप्पी को नहीं माना जाएगा क्रूरता

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है जिसमें वैवाहिक जीवन में संवादहीनता को मानसिक क्रूरता नहीं माना गया। अदालत ने कहा कि पत्नी की आत्महत्या से पहले पति का 13 दिन तक चुप रहना उसे जेल भेजने का आधार नहीं बनता। इस फैसले ने यह स्पष्ट किया है कि वैवाहिक मतभेद और संवादहीनता सामान्य हैं, और बिना ठोस सबूत के केवल संवादहीनता को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। जानें इस संवेदनशील मामले के सभी पहलुओं के बारे में।
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वैवाहिक जीवन में चुप्पी को नहीं माना जाएगा क्रूरता gyanhigyan

क्या रिश्तों की खामोशी बन सकती है जेल की वजह?

क्या वैवाहिक जीवन में संवादहीनता किसी को सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है? सोचिए, जब पति-पत्नी के बीच अनबन होती है और वे एक-दूसरे से बात करना बंद कर देते हैं, क्या यह जेल जाने का कारण बन सकता है? हाल ही में, एक ऐसा मामला सुप्रीम कोर्ट में आया जिसने सभी को चौंका दिया। इस मामले में 'मौन' और 'अपराध' के बीच उलझाव पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और अद्वितीय निर्णय सुनाया है, जो हर विवाहित जोड़े के लिए जानना आवश्यक है। आइए जानते हैं इस संवेदनशील मामले में अदालत ने क्या कहा।


सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पत्नी की आत्महत्या से पहले पति का 13 दिन तक चुप रहना उसे क्रूरता के आरोप में जेल भेजने का आधार नहीं बनाता। अदालत ने आईपीसी की धारा 498ए के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में मतभेद और संवादहीनता सामान्य हैं, और बिना ठोस सबूत के केवल संवादहीनता को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।


पत्नी की आत्महत्या का मामला

अभियोजन पक्ष के अनुसार, संगीता ने 31 जनवरी, 2015 को अपने मायके में आत्महत्या की। पति पर आरोप था कि उसने विवाह के समय पत्नी को दहेज के रूप में नकद और गहने दिए थे और बाद में अतिरिक्त दहेज की मांग की। पति और उसके परिवार के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए और 304बी के तहत मामला दर्ज किया गया।


पति का गुस्सा और संपर्कहीनता

अभियोजन पक्ष का कहना है कि पत्नी के मायके जाने के बाद पति नाराज हुआ और उसने उससे बात करना बंद कर दिया। यह संपर्कहीनता पत्नी के लिए मानसिक पीड़ा का कारण बनी, जिससे उसने आत्महत्या का कदम उठाया।


निचली अदालत का निर्णय

निचली अदालत ने पति को आईपीसी की धारा 304बी के तहत दहेज हत्या के आरोप से बरी कर दिया, लेकिन उसे आईपीसी की धारा 498ए के तहत दोषी ठहराया। उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बरकरार रखा।


पति की नौकरी और पासपोर्ट में देरी

सुप्रीम कोर्ट में पति ने तर्क दिया कि आरोपों के आधार पर आईपीसी की धारा 498ए के तहत कोई अपराध नहीं बनता। अदालत ने पाया कि विवाह के बाद उत्पीड़न का कोई सबूत नहीं मिला।