सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गृहिणियों को 'राष्ट्र निर्माता' मानते हुए मुआवजे का नया आधार
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में गृहिणियों को 'राष्ट्र निर्माता' मानते हुए बिना वेतन वाले घरेलू कार्य की आर्थिक महत्वता को स्वीकार किया है। अदालत ने घरेलू देखभाल सेवाओं के नुकसान के लिए मुआवजे का नया आधार निर्धारित किया है, जिसमें 30,000 रुपये की अनुमानित मासिक आय शामिल है। यह निर्णय न केवल गृहिणियों के योगदान को मान्यता देता है, बल्कि मोटर दुर्घटनाओं के मामलों में मुआवजे की प्रक्रिया को भी प्रभावित करेगा। जानें इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे की कहानी और इसके संभावित प्रभाव।
| Jun 11, 2026, 16:14 IST
महिलाओं की घरेलू भूमिका को मान्यता
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों को 'राष्ट्र निर्माता' की उपाधि दी है और बिना वेतन वाले घरेलू कार्य की आर्थिक महत्वता को स्वीकार किया है। एक महत्वपूर्ण निर्णय में, अदालत ने कहा कि घरेलू देखभाल सेवाओं के नुकसान को 'मुआवजे का एक अलग आधार' माना जाना चाहिए। इसके तहत मोटर दुर्घटनाओं के दावों में ऐसे नुकसान का आकलन करने के लिए 30,000 रुपये की अनुमानित मासिक आय निर्धारित की गई है। जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि घर संभालने वालों का योगदान केवल घरेलू कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे परिवार, समाज और अंततः देश के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गृहिणियों का योगदान
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि बिना वेतन वाले घरेलू कार्य को आर्थिक रूप से महत्वहीन नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें कोई औपचारिक वेतन नहीं मिलता। जस्टिस करोल ने कहा कि गृहिणियां घर में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं और वे राष्ट्र का निर्माण करती हैं। उन्होंने कहा कि गृहिणियों की भूमिका को देखते हुए, हमने घरेलू देखभाल के नुकसान के लिए न्यूनतम मासिक आय 30,000 रुपये निर्धारित की है। यह निर्णय पहले के मामलों पर आधारित है, जैसे 'कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड' (2021) और 'अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड' (2010), जिनमें घर संभालने वालों के कार्य की आर्थिक महत्वता को मान्यता दी गई थी।
मुआवजे का नया आधार
घर की देखभाल न मिल पाने के लिए अलग से मुआवज़ा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'घर की देखभाल न मिल पाने' (loss of domestic care) को मुआवज़े के एक अतिरिक्त और स्वतंत्र आधार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। बेंच ने ऐसे नुकसान का आकलन करने के लिए 30,000 रुपये प्रति महीने की न्यूनतम काल्पनिक आय निर्धारित की। यह तरीका घर संभालने वालों की मेहनत की तुलना कुशल और अकुशल श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी से करने की परंपरा से निकला है।
मोटर दुर्घटना के दावे का मामला
यह निर्णय पंजाब में एक मोटर दुर्घटना के दावे से संबंधित अपील के बाद आया, जिसमें एक मृतक गृहिणी के परिवार ने दो दशकों से अधिक समय से मुआवजे की मांग की थी। अदालत ने मामलों में देरी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मोटर दुर्घटना के दावों का निपटारा आमतौर पर एक वर्ष के भीतर होना चाहिए और सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अपेक्षा की कि वे समय पर निपटारे पर ध्यान दें।
