सिंध में ट्रांसजेंडर कोटा नीति पर विवाद: चिकित्सा परीक्षण की अनिवार्यता
सिंध सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए रोजगार में कोटा की घोषणा के बावजूद, विवादास्पद चिकित्सा परीक्षण की अनिवार्यता ने इसे प्रभावी नहीं होने दिया है। ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस शर्त की आलोचना की है, इसे अपमानजनक और भेदभावपूर्ण बताया है। जानें इस नीति के पीछे की कहानी और ट्रांसजेंडर समुदाय की प्रतिक्रिया।
| May 22, 2026, 20:01 IST
सिंध सरकार की ट्रांसजेंडर कोटा नीति
सिंध सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए रोजगार में कोटा की घोषणा की थी, लेकिन विवादास्पद कानूनी शर्तों के कारण यह नीति प्रभावी नहीं हो पाई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, आवेदकों को अपनी लैंगिक पहचान प्रमाणित करने के लिए शारीरिक चिकित्सा परीक्षण कराना अनिवार्य है। यह कोटा नीति जुलाई 2022 में पारित सिंध सिविल सेवक संशोधन विधेयक के तहत लागू की गई, जिसमें ग्रेड 15 तक की सरकारी नौकरियों में 0.5 प्रतिशत सीटें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षित की गई हैं। हालांकि, इस कानून के तहत भर्ती के लिए आवेदकों को स्थायी मेडिकल बोर्ड से प्रमाण पत्र प्राप्त करना आवश्यक है।
ट्रांसजेंडर समुदाय की प्रतिक्रिया
ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों ने इस शर्त की तीखी आलोचना की है, इसे अपमानजनक और भेदभावपूर्ण बताया है। कराची की ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता ज़हरिश खानज़ादी ने सवाल उठाया कि ट्रांसजेंडर आवेदकों को चिकित्सा जांच से गुजरना क्यों पड़ता है, जबकि अन्य लिंग के उम्मीदवारों को ऐसा करने की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ट्रांसजेंडर नागरिकों को कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद, सरकारी विभागों में भेदभाव जारी है। यह नीति गरिमा को ठेस पहुंचाती है और हाशिए पर पड़े समुदाय के लिए और बाधाएं पैदा करती है।
भर्ती विज्ञापनों में ट्रांसजेंडर कोटा
हाल ही में, आबकारी एवं कराधान विभाग ने पहली बार एक भर्ती विज्ञापन में ट्रांसजेंडर कोटा शामिल किया है, लेकिन केवल प्रमाणित आवेदक ही इसके लिए पात्र होंगे। कार्यकर्ताओं ने कोटा के आकार की आलोचना करते हुए कहा कि 0.5 प्रतिशत का आवंटन पर्याप्त नहीं है। खानज़ादी ने बताया कि कई भर्ती अभियानों में यह प्रतिशत एक भी आरक्षित पद में तब्दील नहीं हो पाता। उन्होंने सिंध सरकार से पंजाब का उदाहरण अपनाने का आग्रह किया, जहां ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए दो प्रतिशत का कोटा है। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के उपाध्यक्ष काज़ी खिज़र ने भी चिकित्सा परीक्षा के प्रावधान का विरोध किया और इसे हटाने की मांग की।
