सहदेवी: एक अद्भुत औषधीय पौधा और इसके लाभ
सहदेवी, जिसे अश फ्लीबेन के नाम से भी जाना जाता है, एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इसकी ऊँचाई एक से तीन फीट तक होती है और यह कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है। आयुर्वेद में इसके अद्भुत गुणों का उल्लेख किया गया है। इस लेख में सहदेवी के विभिन्न उपयोग और इसके 36 चमत्कारी फायदे बताए गए हैं, जो इसे एक अनमोल औषधि बनाते हैं। जानें कैसे यह पौधा विभिन्न रोगों में सहायक हो सकता है।
| May 21, 2026, 22:13 IST
सहदेवी का परिचय
सहदेवी, जिसे अश फ्लीबेन भी कहा जाता है, एक नाजुक पौधा है जिसकी ऊँचाई एक से तीन फीट तक होती है। यह पौधा भले ही कोमल हो, लेकिन तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में इसकी महत्ता किसी विशेषज्ञ से कम नहीं है। इसके अद्भुत गुणों के कारण इसे देवी का दर्जा प्राप्त है। सहदेवी की पत्तियाँ तुलसी या पुदीने की पत्तियों के समान पतली होती हैं, और इसके सफेद फूल होते हैं। यह पौधा मुख्यतः बलुई मिट्टी में पाया जाता है।
संस्कृत में इसे महबला, सहदेवी, सहदेवा, डंडोत्पला, गोवन्दनी, विष्मज्वर्णशनी, और विश्वदेवा के नाम से जाना जाता है। हिंदी में इसे सहदेवी, सदोई, और सदोडी कहा जाता है।
सहदेवी के उपयोग और फायदे
प्रयोजन अंग: मूल, पुष्प, बीज और पंचांग स्वाद: तीखा गुण: स्वेदजन्न, कृमिघ्र, शोथघ्र उपयोग: जलोधर और विषम ज्वर में सहायक।
सहदेवी के 36 अद्भुत लाभ:
- ज्वर में पसीना लाने के लिए इसका काढ़ा या स्वरस दिया जाता है।
- बिस्फोटक में सहदेई के पंचांग का लेप करने से सभी प्रकार के विस्फोटकों का नाश होता है।
- मूत्रदाह रोग में इसका स्वरस दिया जाता है।
- कृमि रोग में इसके बीज का शहद के साथ सेवन लाभकारी होता है।
- अर्श (बवासीर) में इसके पंचांग से लाभ होता है।
- सहदेई का मूल सर के पास रखकर सोने से अच्छी नींद आती है।
- अश्मरी (पथरी) में इसके पत्तों का स्वरस लाभकारी होता है।
- मुख रोग में इसके मूल का काढ़ा कुल्ला करने से लाभ होता है।
- कुष्ट रोग में पीत पुष्प वाली सहदेई का स्वरस पीने से लाभ होता है।
- सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीसकर पीने से ज्वर और पथरी रोग दूर होते हैं।
