सर्वोच्च न्यायालय ने यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर सुरक्षित रखा फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा द्वारा दायर रिट याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रखा है। इस याचिका में लोकसभा अध्यक्ष के महाभियोग प्रस्ताव के लिए गठित जांच समिति को चुनौती दी गई है। न्यायालय ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि समिति में कुछ खामियां हैं। क्या ये खामियां इतनी गंभीर हैं कि कार्यवाही समाप्त की जाए? जानें इस महत्वपूर्ण मामले के बारे में और अधिक जानकारी।
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सर्वोच्च न्यायालय ने यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर सुरक्षित रखा फैसला

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा द्वारा दायर की गई रिट याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। इस याचिका में लोकसभा अध्यक्ष के उस निर्णय को चुनौती दी गई है, जिसमें उनके आधिकारिक निवास पर बेहिसाब नकदी मिलने के मामले में महाभियोग प्रस्ताव के लिए जांच समिति गठित करने का आदेश दिया गया था।


सुनवाई की प्रक्रिया

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने की। न्यायालय ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी की कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति में कुछ खामियां हैं, और यह विचार करेगा कि क्या ये खामियां इतनी गंभीर हैं कि कार्यवाही को समाप्त करने की आवश्यकता हो। 16 दिसंबर, 2025 को न्यायालय ने इस याचिका के संबंध में लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय को नोटिस जारी किया था।


जांच समिति की वैधता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए बनी समिति पर कोई रोक नहीं है, भले ही इसी तरह का प्रस्ताव राज्यसभा में खारिज कर दिया गया हो। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने की।


महाभियोग प्रस्ताव की स्थिति

जस्टिस वर्मा ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत बनी संसदीय जांच समिति की वैधता को चुनौती दी है। यह मामला उनके सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में जला हुआ कैश मिलने से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर 16 दिसंबर 2025 को लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय को नोटिस जारी किया था।


राज्यसभा से प्रस्ताव खारिज

राज्यसभा से प्रस्ताव खारिज होने के बाद, क्या लोकसभा एक समिति बना सकता है? जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुआई वाली बेंच ने जस्टिस वर्मा की ओर से पेश सीनियर वकील मुकुल रोहतगी की कुछ दलीलों से असहमति जताई। रोहतगी ने तर्क किया कि यदि महाभियोग के प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन पेश किए गए हों, तो जांच समिति का गठन दोनों सदनों से संयुक्त रूप से होना चाहिए। चूंकि राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो गया, इसलिए लोकसभा को अकेले जांच समिति बनाने का अधिकार नहीं है।