सकट चौथ व्रत 2026: पारण विधि और आहार के नियम
सकट चौथ व्रत का महत्व
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सकट चौथ पारण विधि: भारतीय परंपरा में सकट चौथ का व्रत विशेष श्रद्धा और नियमों के साथ मनाया जाता है। यह व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है, और वर्ष 2026 में यह 6 जनवरी को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है और इसे संकटों से मुक्ति, संतान सुख और पारिवारिक शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि व्रत का फल तभी मिलता है जब श्रद्धालु इसके नियमों और पारण विधि का पालन सही तरीके से करें।
व्रत में आहार के नियम
सकट चौथ के व्रत में आहार का विशेष महत्व है। जो लोग फलाहार करते हैं, वे फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और मूंगफली जैसे सात्विक खाद्य पदार्थ ले सकते हैं। माघ मास में तिल और गुड़ से बने खाद्य पदार्थों का सेवन शुभ माना जाता है। व्रत के दौरान अन्न, नमक, मसालेदार भोजन, तामसिक और बासी भोजन से बचना चाहिए। मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज और अत्यधिक तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन वर्जित है। शास्त्रों के अनुसार, शुद्ध और सीमित आहार से मन और शरीर में सात्विकता बनी रहती है, जिससे व्रत का आध्यात्मिक प्रभाव बढ़ता है।
पारण का सही समय और विधि
सकट चौथ का पारण अन्य व्रतों से भिन्न होता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस व्रत का पारण चंद्र दर्शन के बाद किया जाता है। आज चंद्रमा 8 बजकर 54 मिनट पर निकलेगा। इसी समय अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाएगा। मान्यता है कि सकट चौथ पर चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाना चाहिए। चंद्रमा को जल, दूध या अक्षत से अर्घ्य अर्पित कर गणेशजी से परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है। पारण के समय हल्का और सात्विक भोजन करना उत्तम माना जाता है। कई श्रद्धालु पहले प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर भोजन करते हैं। यह विधि व्रत की पूर्णता और शुभ फल की प्राप्ति का संकेत मानी जाती है।
व्रत से मिलने वाले लाभ
शास्त्रों और पुराणों में सकट चौथ के व्रत को आत्मसंयम और आंतरिक संतुलन का साधन बताया गया है। यह व्रत व्यक्ति को अनुशासित जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है, जिससे मन और शरीर में शुद्धता आती है। व्रत के दौरान सात्विक आहार, संयमित दिनचर्या और नियमपूर्वक पारण करने से मानसिक अशांति, भय और नकारात्मकता दूर होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह साधना जीवन में आने वाले संकटों को सहन करने की शक्ति प्रदान करती है। विशेष रूप से गृहस्थों के लिए यह व्रत पारिवारिक संबंधों में मधुरता, संतान सुख और मानसिक स्थिरता लाने में सहायक माना गया है।
