शुभांशु शुक्ला: भारत के नए अंतरिक्ष यात्री का ऐतिहासिक मिशन
भारत का नया अंतरिक्ष यान
जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राकेश शर्मा से पूछा था कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है, तो उन्होंने उत्तर दिया था, 'सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा।' 25 जून 2025 को, जैसे ही घड़ी ने 12:01 का समय दिखाया, भारत का दिल एक साथ धड़क उठा। अमेरिका के कनेडी स्पेस सेंटर से फाल्कन रॉकेट के जरिए स्पेस एक्स का ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट आसमान में उड़ान भरने लगा। इस मिशन में एक भारतीय, शुभांशु शुक्ला, का नाम इतिहास में दर्ज हुआ। राकेश शर्मा के बाद, भारत ने 41 वर्षों तक इस पल का इंतजार किया था। लखनऊ के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने इस इंतजार को समाप्त किया। एक्सियम4 मिशन, जो नासा और स्पेस एक्स का एक अंतरराष्ट्रीय अभियान है, केवल पश्चिमी देशों के लिए वैज्ञानिक प्रयोग नहीं था, बल्कि इसमें भारत की भावनाएं और आकांक्षाएं भी शामिल थीं। शुभांशु ने उड़ान से पहले कहा कि यह उनकी उड़ान नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सपनों की उड़ान है।
शुभांशु शुक्ला का परिचय
शुभांशु शुक्ला एक डेकोरेटेड और टेस्ट पायलट हैं। उनके परिवार का भी उनकी सफलता में महत्वपूर्ण योगदान है। उनके पिता, रामभू दयाल शुक्ला, यूपी सचिवालय से रिटायर्ड जॉइंट सेक्रेटरी हैं। उनकी मां ने हमेशा उनके सपनों का समर्थन किया। उनकी पत्नी काम्या एक डेंटिस्ट हैं और उनका छह साल का बेटा किियाश भी इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनने के लिए उत्साहित है। शुभांशु तीन भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं, और उनकी बहनें निधि और सुची हमेशा उनका समर्थन करती आई हैं। वह अपने परिवार के पहले सदस्य हैं जिन्होंने डिफेंस फोर्सेस में शामिल होने का निर्णय लिया।
अंतरिक्ष यात्रा का सफर
डिपार्चर बर्न: स्पेस स्टेशन से अलग होने के बाद, यान पृथ्वी की कक्षा में घूमने लगता है। इस प्रक्रिया में इंजन बर्न कर यान कक्षा से बाहर जाने लगता है।
फेजिंग बर्न: इस चरण में यान अपनी कक्षा को इस तरह से बदलता है कि वह सही समय पर पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सके। इसे ऑर्बिटल फेजिंग कहा जाता है।
डी-ऑर्बिट बर्न: यान पृथ्वी की ओर गिरने के लिए अंतिम बार अपने इंजन को जलाता है, जिससे उसकी गति और ऊंचाई कम होती है।
ट्रंक को अलग करना: स्पेसक्राफ्ट का पीछे वाला हिस्सा, जो ऊर्जा और सहायक प्रणाली ले जाता है, उसे मुख्य कैप्सूल से अलग कर दिया जाता है।
वायुमंडल में प्रवेश: यह सबसे कठिन चरण होता है, जब यान अत्यधिक गति और गर्मी के साथ पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है।
पैराशूट खोलना: वायुमंडल में घर्षण के कारण यान की गति धीमी हो जाती है, इसके बाद एक के बाद एक पैराशूट खुलते हैं।
पानी में उतरना: अंत में, यान महासागर में धीरे-धीरे उतरता है, जिसे स्प्लैशडाउन कहा जाता है।
गगनयान मिशन के लिए शुभांशु की तैयारी
शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष में जीवन को समझने के लिए सात महत्वपूर्ण प्रयोग किए हैं, जो गगनयान मिशन के लिए महत्वपूर्ण होंगे। इन प्रयोगों में माइक्रोएल्गी और बीजों का अंकुरण शामिल हैं। सूक्ष्म जीवों पर अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि जीवन अत्यधिक तापमान में कैसे जीवित रह सकता है। मांसपेशियों पर शोध से यह जानने की कोशिश की गई कि अंतरिक्ष में कोशिकाएं कैसे व्यवहार करती हैं। हरित शैवाल पर अध्ययन यह देखने के लिए था कि क्या इनका विकास अंतरिक्ष में संभव है।
मिशन का समय और सहयोग
शुभांशु शुक्ला और अन्य तीन अंतरिक्ष यात्रियों ने 20 दिन के इस मिशन में 18 दिन अंतरिक्ष स्टेशन पर बिताए। यह अमेरिकी कंपनी स्पेसएक्स द्वारा इंसानों को कक्षा में भेजने का 18वां मिशन था। भारत ने इस प्राइवेट अंतरिक्ष मिशन पर लगभग 550 करोड़ रुपए खर्च किए।
इस मिशन के दौरान, अंतरिक्ष यात्रियों ने 31 देशों के सहयोग से 60 से अधिक वैज्ञानिक प्रयोग और तकनीकी परीक्षण किए। मिशन की शुरुआत 26 जून को फ्लोरिडा स्थित नासा के केनेडी स्पेस सेंटर से हुई थी।
