शशि थरूर ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के गायन पर उठाए सवाल
राष्ट्रगीत के गायन पर थरूर की टिप्पणी
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के सभी पांच अंतरों को गाने की अनिवार्यता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। केरल में इस मुद्दे को लेकर चल रहे विवाद के बीच, संवाददाताओं से बातचीत में थरूर ने इसे श्रोताओं के लिए "अनावश्यक और बोझिल" बताया।
थरूर ने कहा कि वंदे मातरम का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन हर समारोह में इसके सभी अंतरे गाना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने कहा, “जब हम वंदे मातरम गाते हैं, तो हम सम्मानपूर्वक खड़े होते हैं। इसका पहला अंतरा या शुरुआती दो अंतरे अधिकांश लोगों को याद होते हैं।”
परंपरा और नियमों पर विचार
थरूर ने बताया कि परंपरागत रूप से यह गीत किसी कार्यक्रम की शुरुआत में एक बार गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगान अलग से, अक्सर अंत में गाया जाता है। उन्होंने कहा, “अब यह नियम बनाया गया है कि हर कार्यक्रम की शुरुआत और अंत में सभी पांच अंतरे गाए जाएं। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक नियम है।”
थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है और कहा, “हम सभी वंदे मातरम का सम्मान करते हैं। मैं खुशी से इसे गा सकता हूं।”
वंदे मातरम का इतिहास
वंदे मातरम: इतिहास और महत्वपूर्ण तथ्य
इस विवाद के बीच यह जानना आवश्यक है कि 'वंदे मातरम' का इतिहास क्या है और इसे लेकर हमारे संविधान में क्या प्रावधान हैं।
'वंदे मातरम' की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी और इसे उनके प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में शामिल किया गया। यह मूल रूप से संस्कृत और बंगाली का मिश्रण है।
ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत देशभक्ति का प्रतीक बन गया। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार राजनीतिक मंच पर गाया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'जन गण मन' को राष्ट्रगान और 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान के बराबर सम्मान दिया जाएगा।
आधिकारिक तौर पर, दूरदर्शन, आकाशवाणी और संसद के सत्रों की शुरुआत में वंदे मातरम के केवल पहले अंतरे को गाया जाता है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की वंदना है। पूरे पांच अंतरे आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में नहीं गाए जाते।
