शरजील इमाम को मिली अंतरिम जमानत, विवाह में शामिल होने का मौका
शरजील इमाम की जमानत का विवरण
साल 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मामले में आरोपी शरजील इमाम आज लगभग छह साल बाद जेल से बाहर आए। स्थानीय अदालत ने उन्हें सीमित समय के लिए अंतरिम जमानत दी है, ताकि वे अपने छोटे भाई के विवाह में शामिल हो सकें और अपनी बीमार मां से मिल सकें। यह निर्णय 9 मार्च को कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी द्वारा सुनाया गया।
जमानत की शर्तें
अदालत ने शरजील इमाम को 20 मार्च से 30 मार्च 2026 तक कुल 10 दिनों की अंतरिम जमानत दी है। इसके लिए उन्हें 50 हजार रुपये के निजी मुचलके के साथ दो जमानती प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। जमानत के दौरान कई सख्त शर्तें भी लागू की गई हैं।
विवाह की तैयारी और शरजील की उपस्थिति
शरजील इमाम ने अदालत से छह सप्ताह की अंतरिम जमानत की मांग की थी, यह बताते हुए कि उनके छोटे भाई मुज्जम्मिल इमाम का विवाह 25 मार्च को है। उनके वकील ने कहा कि बड़े भाई के रूप में शरजील की उपस्थिति विवाह के कार्यक्रमों में आवश्यक है। विवाह समारोह 22 से 28 मार्च के बीच आयोजित होने वाले हैं। इसके अलावा, शरजील की मां की बीमारी का भी उल्लेख किया गया, जिसके कारण उनकी देखभाल में शरजील की उपस्थिति जरूरी है।
अभियोजन पक्ष का विरोध
हालांकि, अभियोजन पक्ष ने इस मांग का विरोध किया। सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि विवाह की तैयारियां पहले से ही पूरी हो चुकी हैं और शरजील की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। इसके अलावा, अभियोजन ने यह भी बताया कि शरजील की नियमित जमानत याचिकाएं पहले ही खारिज की जा चुकी हैं।
अदालत के निर्देश
अदालत ने अंतरिम जमानत के दौरान कई स्पष्ट निर्देश भी दिए हैं। शरजील को किसी भी गवाह या मामले से जुड़े व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं होगी। उन्हें अपना मोबाइल नंबर जांच अधिकारी को देना होगा और इसे सक्रिय रखना होगा। इसके अलावा, उन्हें मीडिया से बातचीत करने और सोशल मीडिया का उपयोग करने से भी दूर रहने का निर्देश दिया गया है।
जेल में वापसी की शर्तें
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शरजील इमाम को 30 मार्च की शाम तक जेल अधीक्षक के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से संबंधित है, जिसमें 50 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी।
मानवीय आधार पर राहत
इस निर्णय को मानवीय आधार पर दी गई सीमित राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें न्यायिक प्रक्रिया और पारिवारिक परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस राहत का दुरुपयोग भी हो सकता है।
