रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने परियोजनाओं में देरी पर जताई चिंता

बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा और एयरोस्पेस परियोजनाओं में हो रही देरी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समयसीमा का पालन न करने से न केवल लागत में वृद्धि होती है, बल्कि तकनीक भी पुरानी हो सकती है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर देते हुए, उन्होंने सरकारी और निजी कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। जानें और क्या कहा राजनाथ सिंह ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर।
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बेंगलुरु में रक्षा मंत्री की महत्वपूर्ण टिप्पणी

बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा और एयरोस्पेस परियोजनाओं में हो रही देरी को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने 18 सितंबर 2026 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के कार्यक्रम में कहा कि परियोजनाओं में देरी को गंभीरता से लेना आवश्यक है, क्योंकि इससे न केवल रक्षा आवश्यकताओं में कमी आती है, बल्कि लागत भी बढ़ जाती है।


समयसीमा और तकनीकी चुनौतियाँ

राजनाथ सिंह ने बताया कि रक्षा परियोजनाओं के लिए निर्धारित समयसीमा वास्तविक और व्यावहारिक होनी चाहिए। उन्होंने तकनीकी कारणों से होने वाली देरी का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि परियोजनाएँ लंबे समय तक अटकी रहती हैं, तो इससे लागत में वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, तेजी से बदलती तकनीक के कारण, जो तकनीक विकसित करने में समय लगता है, वह उपकरण तैयार होने तक पुरानी हो सकती है।


आत्मनिर्भरता और सहयोग पर जोर

यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब स्वदेशी रक्षा उत्पादन और एयरोस्पेस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर दिया जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान, HAL ने भारतीय वायुसेना को दो LCA तेजस ट्रेनर और तीन HTT-40 बेसिक ट्रेनर विमान सौंपे। इसके साथ ही, पवन हंस को चार ध्रुव नेक्स्ट जेनरेशन हेलीकॉप्टर भी प्रदान किए गए।


भविष्य की तकनीक पर ध्यान

राजनाथ सिंह ने सरकारी और निजी कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ाने और स्वदेशी तकनीक के विकास की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि एयरोस्पेस क्षेत्र में क्षमता निर्माण एक क्रमिक प्रक्रिया है और इसके लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने रक्षा उद्योग से भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नई तकनीक विकसित करने का आह्वान किया।


समयसीमा और तकनीकी विकास का तालमेल

उनका जोर इस बात पर था कि रक्षा परियोजनाओं में समयसीमा, तकनीकी विकास और उत्पादन क्षमता के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जाए, ताकि देश की रक्षा आवश्यकताएँ समय पर पूरी हो सकें और विकसित की गई तकनीक समय के साथ अप्रासंगिक न हो।