मोहन भागवत ने राम मंदिर और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर विचार साझा किए

आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में एक कार्यक्रम में राम मंदिर निर्माण और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत को 'हिंदू राष्ट्र' के रूप में औपचारिक रूप से घोषित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह हमेशा से ऐसा रहा है। भागवत ने समाज की बदलती मानसिकता पर भी प्रकाश डाला और बताया कि अब लोग हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र मानते हैं। उनका यह संबोधन न केवल मंदिर निर्माण की सफलता का उत्सव था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक जड़ों को पहचानने का एक आह्वान भी था।
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मोहन भागवत ने राम मंदिर और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर विचार साझा किए gyanhigyan

भारत की सांस्कृतिक पहचान पर मोहन भागवत के विचार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को नागपुर के रेशिमबाग में आयोजित एक समारोह में भारत की सांस्कृतिक पहचान और राम मंदिर के निर्माण पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत को 'हिंदू राष्ट्र' के रूप में औपचारिक रूप से घोषित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अपनी प्रकृति और आत्मा से हमेशा से एक हिंदू राष्ट्र रहा है।


आरएसएस की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, भागवत ने उन व्यक्तियों का सम्मान किया, जिनके नेतृत्व में मंदिर का निर्माण हुआ। उन्होंने कहा कि यह निर्माण भगवान राम की इच्छा से हुआ है। भागवत ने इसे भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने के कार्य से जोड़ा, यह बताते हुए कि ऐसे कार्य तभी संभव होते हैं जब सभी का योगदान हो।


उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई सरकार का गठन किया, तब लंदन के एक प्रमुख समाचार पत्र ने लिखा कि इस दिन भारत ने वास्तव में ब्रिटिश शासन को अलविदा कहा।


भागवत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या बिना प्रतिबद्ध नेतृत्व के राम मंदिर का निर्माण संभव था। उन्होंने कहा कि पहले हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र कहना मजाक समझा जाता था, लेकिन अब लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है।' उन्होंने यह भी बताया कि कई लोग आरएसएस से भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग करते हैं, लेकिन संघ का मानना है कि जो सत्य पहले से विद्यमान है, उसे घोषित करने की आवश्यकता नहीं है।


'हिंदू राष्ट्र' पर बदलता नजरिया


मोहन भागवत ने समाज की बदलती मानसिकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि:


उपहास से स्वीकृति तक: पहले भारत को 'हिंदू राष्ट्र' कहना मजाक समझा जाता था, लेकिन अब लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं।


सत्य की उद्घोषणा: अब वही लोग मानते हैं कि हिंदुस्तान हिंदुओं की भूमि है।


घोषणा की जरूरत नहीं: संघ प्रमुख ने उन मांगों का जवाब दिया जो भारत को आधिकारिक रूप से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की बात करती हैं। उन्होंने कहा, 'जो बात पहले से सच है, उसे बार-बार घोषित करने की क्या आवश्यकता है?'


रेशिमबाग में आयोजित यह कार्यक्रम उन शिल्पकारों और मार्गदर्शकों के सम्मान में था, जिन्होंने मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भागवत का यह संबोधन न केवल मंदिर निर्माण की सफलता का उत्सव था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक जड़ों और उसकी पहचान को पुनः पहचानने का एक आह्वान भी था। उनके अनुसार, मंदिर का अस्तित्व भारत के स्वाभिमान और उसकी प्राचीन पहचान के पुनरुत्थान का प्रतीक है।