मोहन भागवत का आरक्षण पर बयान: जाति व्यवस्था की प्रासंगिकता खत्म

आरएसएस प्रमुख का महत्वपूर्ण बयान
गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने 'संघ की 100 वर्ष यात्रा' के तहत आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला में मीडिया के सवालों का जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ तब तक आरक्षण का समर्थन करता रहेगा जब तक लाभार्थियों को इसकी आवश्यकता महसूस होती है। भागवत ने कहा कि जाति व्यवस्था का अब कोई महत्व नहीं है और जाति-आधारित आरक्षण को संवेदनशीलता के साथ समझा जाना चाहिए।
जाति आधारित भेदभाव का अंत
व्याख्यान श्रृंखला के अंतिम दिन, भागवत ने जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि आरएसएस इस दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि संघ संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण का समर्थन करता है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक लाभार्थियों को यह महसूस नहीं होता कि अब इसकी आवश्यकता नहीं है।
आरक्षण पर संघ का दृष्टिकोण
भागवत ने बताया कि जब बालासाहेब देवरस संघ के प्रमुख थे, तब आरक्षण के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया गया था। उन्होंने कहा कि उस समय विभिन्न विचारों का विरोध हुआ था, लेकिन अंततः सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ। संघ का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कमजोर वर्गों को आरक्षण का लाभ मिले।
संघ का सामाजिक दायित्व
भागवत ने कहा कि संघ के स्वयंसेवक वंचित वर्गों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों को ऐसे मामलों में सक्रिय रहना चाहिए और पीड़ितों को न्याय दिलाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह संघ की कमी है।
धार्मिक नेताओं की भूमिका
मनुस्मृति के संदर्भ में पूछे गए सवाल पर भागवत ने कहा कि 1972 में कर्नाटक के उडुपी में सभी धार्मिक नेताओं ने छुआछूत के खिलाफ एकमत होकर कहा था। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय समाज में सभी वर्गों और जातियों को शामिल करने के लिए धार्मिक नेताओं को एक नई स्मृति बनाने पर विचार करना चाहिए।
सामाजिक समरसता की दिशा में संघ का प्रयास
भागवत ने कहा कि आरएसएस सामाजिक समरसता लाने के लिए प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि सभी को समाज का हिस्सा मानना चाहिए और ऊंच-नीच की भावना को समाप्त करना होगा। संघ इस दिशा में काम कर रहा है।