मोदी और नेहरू: नीतियों में टकराव और ऐतिहासिक फैसले
नेहरू और मोदी के विचारों में भिन्नता
नरेंद्र मोदी के भाषणों में पंडित जवाहरलाल नेहरू का उल्लेख और उनके निर्णयों पर उठाए गए सवाल बिना कारण नहीं हैं। यह व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि विचारधाराओं में अंतर का परिणाम है। नेहरू ने संघ और जनसंघ की विचारधारा को सांप्रदायिक बताया और यह सिखाया कि अल्पसंख्यकों की तुलना में बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता अधिक खतरनाक होती है। उनके उत्तराधिकारी इस सोच को आगे बढ़ाते रहे, जबकि संघ और भाजपा ने इसे वोट बैंक की राजनीति के लिए तुष्टिकरण करार दिया।
योजना आयोग से नीति आयोग का परिवर्तन
पंडित नेहरू ने 15 मार्च 1950 को योजना आयोग की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश के संसाधनों का विकास करना था। यह आयोग कृषि, उद्योग, और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में लक्ष्यों का निर्धारण करता था। हालांकि, मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में योजना आयोग को समाप्त कर 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग की स्थापना की। इस नए आयोग ने देश की वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता दी और राज्यों की भूमिका को बढ़ाया।
नेहरू का संघ पर दृष्टिकोण
पंडित नेहरू ने हमेशा संघ की गतिविधियों पर नजर रखी और इसे सांप्रदायिक राजनीतिक दल बताया। उन्होंने कहा कि बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता से अधिक खतरनाक हो सकती है। नेहरू का मानना था कि यदि संघ का मुकाबला नहीं किया गया, तो यह भारत को उसकी जड़ों से उखाड़ देगा।
मोदी का अल्पसंख्यकों के प्रति दृष्टिकोण
प्रधानमंत्री मोदी ने नेहरू की उस सोच को चुनौती दी, जो अल्पसंख्यकों के संरक्षण पर केंद्रित थी। उन्होंने 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा दिया और सरकारी योजनाओं में भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया। हालांकि, नागरिकता कानून और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर उन्होंने विरोध की परवाह नहीं की।
सिंधु जल संधि का निलंबन
मोदी सरकार ने 24 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान के साथ 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया। यह संधि भारत की उदारता का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन पाकिस्तान के शत्रुतापूर्ण रवैये के कारण मोदी ने इसे निलंबित करने का निर्णय लिया।
संघ का राष्ट्रवाद और नेहरू की सोच
नेहरू ने संघ के राष्ट्रवाद को हिंदू सांप्रदायिकता के दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने कहा कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मोदी ने इस सोच को चुनौती देने का कोई अवसर नहीं छोड़ा और नेहरू के विचारों को पीछे छोड़ने का प्रयास किया।
