मोती की खेती: छोटे शहरों में उभरता नया व्यवसाय
मोती की खेती का नया युग
एक समय था जब भारत में मोती की खेती केवल समुद्र तटों और महासागरों तक सीमित थी। अब, यह प्रक्रिया छोटे शहरों में भी तेजी से फैल रही है। आजीविका के एक नए स्रोत के रूप में, मोती की खेती छोटे शहरों में किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बन गई है। किसान अब उन्नत तकनीकों का उपयोग करके जलभराव वाली भूमि को लाभदायक एक्वाकल्चर में बदल रहे हैं।
मुरादाबाद में मोती की खेती का विकास
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में, मोती की खेती कौशल विकास और आधुनिक कृषि तकनीकों के माध्यम से रोजगार के नए अवसर प्रदान कर रही है। यहां के तालाब साधारण दिखते हैं, लेकिन उनके नीचे एक जटिल प्रणाली है, जिसमें सीपियों की खेती की जाती है।
डॉ. दीपक महदीरत्ता का योगदान
मुरादाबाद में मोती की खेती की शुरुआत डॉ. दीपक महदीरत्ता ने की थी। उनकी भूमि का स्तर कम था, जिससे पारंपरिक खेती में कठिनाई होती थी। उन्होंने मोती की खेती का विकल्प चुना और कहा, "हमारी भूमि में अक्सर पानी भर जाता था, जिससे खेती करना मुश्किल हो गया था।"
मुनाफे की संभावनाएं
डॉ. महदीरत्ता ने बताया कि मोती की खेती में एक विशेष प्रक्रिया के तहत सीपियों में एक 'न्यूक्लियस' डाला जाता है। इसके बाद, उन्हें नियंत्रित वातावरण में रखा जाता है, जहां वे प्राकृतिक रूप से मोती बनाते हैं। यह प्रक्रिया धैर्य और सही जल प्रबंधन की मांग करती है, लेकिन पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक लाभकारी है।
स्थानीय किसानों को प्रशिक्षण
महदीरत्ता अब स्थानीय युवाओं और किसानों को मोती की खेती की ट्रेनिंग दे रहे हैं। छात्र अनमोल चहल ने कहा कि मोती की खेती छोटे किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प है। उन्होंने कहा, "कम भूमि वाले किसान पारंपरिक तरीकों की तुलना में मोती की खेती से अधिक कमा सकते हैं।"
अन्य किसानों की भागीदारी
इस मॉडल से प्रेरित होकर, स्थानीय किसान सुनीता और सुभाष चंद्र ने भी मोती की खेती शुरू की है। सुभाष ने बताया, "मेरे नाम पर 25,000 और मेरी पत्नी के नाम पर 25,000 सीप रजिस्टर्ड हैं।" मुरादाबाद का यह मॉडल नए तरीकों और विकल्पों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने का एक उदाहरण बन रहा है।
