मेजर मोहित शर्मा: एक सच्चे नायक की कहानी

मेजर मोहित शर्मा की कहानी एक सच्चे नायक की है, जिन्होंने आतंकियों के बीच घुसकर अपने देश की रक्षा की। 2004 में कश्मीर में एक अद्भुत मिशन के दौरान उन्होंने अपनी पहचान बदलकर आतंकियों को मात दी। उनकी वीरता और बलिदान को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। जानें कैसे उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस तक देश की सेवा की और आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में जीवित हैं।
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मेजर मोहित शर्मा: एक सच्चे नायक की कहानी

कश्मीर में एक अद्भुत मिशन

मार्च 2004 में श्रीनगर की बर्फीली पहाड़ियों पर एक लकड़ी के घर में आतंकियों के बीच हलचल थी। हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकी इफ्तिखार रसोई में काहबा बना रहा था, जबकि अबू तुरारा और अबू सब्जार एक कमरे में फुसफुसा रहे थे। अचानक, इफ्तिखार ट्रे में काहबा के कप लेकर कमरे में दाखिल होता है। सब्जार ने उसे अपनी AK-47 तान दी और गुस्से में पूछा, 'तुम कौन हो?' इफ्तिखार ने सावधानी से ट्रे नीचे रखकर कहा, 'भाईजान, मैंने आपको अपनी कहानी बताई थी, फिर भी आप विश्वास नहीं कर रहे।' इस पर तुरारा ने सहमति में सिर हिलाया और सब्जार ने अपनी बंदूक नीचे कर ली। जैसे ही दोनों ने इफ्तिखार की पीठ की, उसने अपनी पिस्तौल निकाली और दोनों आतंकियों को मार गिराया। असल में, इफ्तिखार भारत के वन पैरा एसएफ के जांबाज कमांडो मोहित शर्मा थे, जो इन आतंकियों को खत्म करने के लिए पिछले दो महीनों से तैयार थे।


मोहित शर्मा की वीरता

मोहित शर्मा की कहानी एक सच्चे नायक की है। उन्होंने आतंकियों के बीच घुसकर उनकी आंखों में झूठ का सुरमा लगाया और एक पल में उन्हें खत्म कर दिया। 2004 में, जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, मोहित ने एक कमांडो के रूप में अपनी पहचान बदलकर इफ्तिखार भट्ट नाम से आतंकियों के बीच घुसपैठ की। उन्होंने कहा कि उनका भाई सेना ने मार दिया है और बदला लेना चाहते हैं। आतंकियों ने उनकी आंखों में झांका, लेकिन मोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, 'अगर भरोसा नहीं है, तो गोली मार दो।' इस पर उन्होंने तेजी से दो आतंकियों को खत्म कर दिया।


अंतिम मिशन

अक्टूबर 2008 में मोहित को फिर से कश्मीर भेजा गया। मार्च 2009 में, उन्हें एक ऑपरेशन के लिए 25 कमांडोस के साथ भेजा गया। उन्होंने जंगल में आतंकियों का पीछा किया और एक टीम के साथ मिलकर चार आतंकियों को मार गिराया। इस दौरान मोहित को कई बार गोली लगी, लेकिन उन्होंने अपने साथियों को बचाने के लिए फायरिंग जारी रखी। अंततः, 31 साल की उम्र में, मोहित ने अपने जीवन की अंतिम सांस ली, लेकिन उनकी वीरता को हमेशा याद रखा जाएगा।


मरणोपरांत सम्मान

मेजर मोहित शर्मा को उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी, लेफ्टिनेंट कर्नल रिशिमा शर्मा, भी भारतीय सेना में एक अधिकारी हैं। मोहित की कहानी आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में जीवित है, और जब भी सच्चे नायक की बात होती है, तो उनका नाम सबसे पहले लिया जाता है।