मुंबई: मराठी समाज की पहचान और अस्तित्व का संकट
मुंबई का इतिहास और वर्तमान स्थिति
मुंबई, जो देश की आर्थिक राजधानी मानी जाती है, का उदय मराठी भाषी समुदाय के संघर्ष और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के बलिदानों से हुआ। इस महानगर को पहले मराठी संस्कृति और श्रमिक वर्ग का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब यह मराठी समाज के लिए पहचान और अस्तित्व के संकट का प्रतीक बनता जा रहा है।
1. बदलती मुंबई की तस्वीर
लालबाग, परेल, शिवड़ी, दादर और गिरगांव कभी मुंबई की आत्मा के रूप में जाने जाते थे। यहाँ मिल मजदूरों की बस्तियाँ और मराठी संस्कृति का विकास हुआ। लेकिन समय के साथ, मिलें बंद हो गईं और उनकी जगह कांच के ऊँचे टावर खड़े हो गए। शहरीकरण के नाम पर शहर का चेहरा बदला, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर मराठी समाज पर पड़ा।
रीडेवलपमेंट के दौरान स्थानीय मराठी लोगों को घर देने का वादा किया गया था, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही निकली। बड़ी संख्या में मराठी परिवारों को दूर-दराज के क्षेत्रों में बसना पड़ा, जबकि जिनके नाम पर राजनीति होती रही, वे धीरे-धीरे मुंबई से बाहर होते चले गए।
2. आर्थिक सशक्तिकरण: क्या मराठी समाज पीछे रह गया?
मुंबई महानगरपालिका का वार्षिक बजट 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक है, जो पिछले 25 वर्षों में लाखों करोड़ तक पहुँच चुका है।
इस विशाल बजट के बावजूद, सवाल उठता है कि कितने मराठी ठेकेदार या उद्यमी इस व्यवस्था से लाभान्वित हुए हैं। आरोप हैं कि बड़े ठेके और परियोजनाएं केवल कुछ प्रभावशाली समूहों तक सीमित रह गईं, जबकि मराठी युवा और स्थानीय ठेकेदार हाशिए पर रहे।
3. नारे और ज़मीनी बदलाव
चुनावों में 'मराठी मानुष', 'मराठी अस्मिता' और 'मुंबई हमारी है' जैसे नारे गूंजते रहे हैं। लेकिन सत्ता में रहते हुए ये नारे ठोस नीतियों में क्यों नहीं बदले, यह सवाल अब आम मराठी नागरिक पूछ रहा है।
मराठी शिक्षा इसका एक बड़ा उदाहरण है। मनपा के मराठी स्कूल बंद होते गए, जबकि निजी अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल तेजी से बढ़े।
4. रोज़ की जद्दोजहद
आज बड़ी संख्या में मराठी लोग ठाणे, पालघर और रायगढ़ जिलों से रोज़ मुंबई काम करने आते हैं। चार से पाँच घंटे का सफर उनकी दिनचर्या बन चुका है।
आरोप है कि पालिका ने किफायती आवास की कोई ठोस योजना लागू नहीं की, जिससे पुराने मराठी निवासी बढ़ते खर्च के कारण शहर से बाहर होते चले गए।
5. चुनावी मौसम और बदलता मिज़ाज
अब जब बीएमसी चुनाव नज़दीक हैं, तो 'मराठी मानुष के रक्षक' होने के दावे फिर से सुनाई दे रहे हैं। लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है।
जो लोग पीढ़ियों से एक ही पार्टी को वोट देते आए, वे अब अपने बच्चों के भविष्य और रोजगार का हिसाब मांग रहे हैं।
6. भावनाओं से आगे की राजनीति की मांग
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लंबे शासन के बावजूद मराठी समाज की समग्र तरक्की नहीं हो पाई।
आज का मराठी युवा स्पष्ट रूप से कह रहा है—भावनाओं से वोट लिया जा सकता है, लेकिन ज़िंदगी नहीं चलाई जा सकती।
