मुंबई नगर निगम चुनाव: उद्धव और राज ठाकरे का गठबंधन और मराठी मानुष का मुद्दा

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने 15 जनवरी को बृहन्मुंबई नगर निगम चुनावों के लिए अपने दलों के बीच गठबंधन की घोषणा की है। इस गठबंधन का उद्देश्य राजनीतिक समीकरणों को बदलना है। मराठी मानुष का मुद्दा चुनावों में महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि मुंबई की 35-37% आबादी मराठी भाषी है। जानें कैसे शिवसेना का इतिहास और वर्तमान राजनीतिक स्थिति इस चुनाव को प्रभावित कर सकती है।
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मुंबई नगर निगम चुनाव: उद्धव और राज ठाकरे का गठबंधन और मराठी मानुष का मुद्दा

गठबंधन की घोषणा

शिवसेना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने 15 जनवरी को होने वाले बृहन्मुंबई नगर निगम चुनावों के लिए अपने दलों के बीच गठबंधन की जानकारी दी है। इस गठबंधन का उद्देश्य देश के सबसे समृद्ध नगर निकाय का ताज हासिल करने की दौड़ में राजनीतिक समीकरणों को बदलना है। राज ठाकरे ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वे नगर निगमों पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं, तो "मराठी मानुष" कमजोर हो जाएंगे।


मराठी मानुष का मुद्दा

बृहन्मुंबई नगर निगम चुनावों में हमेशा से मराठी मानुष का मुद्दा प्रमुख रहा है। यह मुद्दा दशकों से मुंबई की राजनीति का केंद्र बना हुआ है। शहर के जनसांख्यिकीय बदलावों के बावजूद, मराठी भाषी निवासियों में अपनी भाषाई पहचान को लेकर एक मजबूत भावना ने शहर की राजनीति को प्रभावित किया है। इस जटिलता ने 1960 के दशक में शिवसेना के उदय जैसे कई महत्वपूर्ण विचारों को जन्म दिया।


शिवसेना का उदय और विकास

शिवसेना ने भूमिपुत्रों, यानी मराठी मानुषों के अधिकारों की रक्षा करने का वादा किया, जो मुंबई में बेहतर अवसरों की तलाश में आने वाले प्रवासियों के कारण हाशिए पर महसूस कर रहे थे। शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने मराठी युवाओं को आकर्षित किया। हालांकि, समय के साथ, शिवसेना ने अपने मूल मुद्दों से ध्यान हटाकर हिंदुत्व के विचार को अपनाना शुरू किया। चुनावी मोर्चे पर, इसका परिणाम शिवसेना और भाजपा के बीच गठबंधन के रूप में सामने आया, जिससे दोनों पार्टियों ने 1984 के लोकसभा चुनाव एक साथ लड़ा।


विभाजन और चुनौतियाँ

हालांकि, शिवसेना में विभाजन हुआ, जिसमें राज ठाकरे पहले अलग हुए। बाला साहेब ठाकरे के समय में, शिवसेना का प्रभाव मुंबई और उसके आसपास के क्षेत्रों में मजबूत था। बीएमसी चुनाव हमेशा शिवसेना के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं, क्योंकि पार्टी ने मराठी मानुष के मुद्दे पर दशकों तक राज किया है। 2019 में शिवसेना और भाजपा के बीच संबंधों में बदलाव आया।


वोट बैंक का बंटवारा

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना में भी विभाजन हुआ, जिससे उनका गुट कमजोर पड़ गया। इस बार का चुनाव उद्धव के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मराठी मानुष का मुद्दा फिर से उठाया जा रहा है। एकनाथ शिंदे की शिवसेना भाजपा के साथ है और वे भी मराठी मानुष की बात कर रहे हैं। मुंबई की लगभग 35-37% आबादी मराठी भाषी मतदाताओं की है, जो शिवसेना के बीएमसी पर प्रभुत्व का आधार रही है।


आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ

मराठी समुदाय में नाराजगी का एक बड़ा कारण यह है कि मुंबई जैसे क्षेत्रों में प्रवासियों की संख्या बढ़ गई है, जिससे मराठी मानुष हाशिए पर आ गए हैं। आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। इस बार के चुनाव में मराठी अस्मिता का मुद्दा महत्वपूर्ण हो सकता है, और वोटों के बंटने की संभावनाएँ भी अधिक हैं।