मिडिल ईस्ट संकट का भारत की अर्थव्यवस्था पर सीमित प्रभाव: आरबीआई
भारत में रेमिटेंस पर संकट का असर
मिडिल ईस्ट में चल रहे संकट के चलते वहां से आने वाले रेमिटेंस पर प्रभाव पड़ने की खबरें आई हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर देखने को मिला है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। आरबीआई की उप-गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद भारत में विदेशों से भेजे जाने वाले मनी ऑर्डर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा और देश का भुगतान संतुलन संतोषजनक स्थिति में रहेगा। उन्होंने बताया कि भारत के भुगतान संतुलन में कुछ अंतर्निहित मजबूती है, जिसमें मजबूत रेमिटेंस, सर्विस एक्सपोर्ट और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) शामिल हैं।
रेमिटेंस की मात्रा
गुप्ता ने बताया कि भारत को हर साल 135 अरब डॉलर से अधिक रेमिटेंस प्राप्त होते हैं, और यह राशि लगातार बढ़ रही है। कोविड-19 जैसे संकट के दौरान भी इसमें केवल मामूली गिरावट आई थी। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया का हिस्सा भारतीय रेमिटेंस में घटकर लगभग 40 प्रतिशत रह गया है, और प्रवासी भारतीयों का कार्यक्षेत्र अब अधिक विविध हो गया है। अब वे आईटी, होटल, स्वास्थ्य, शिक्षा और निर्माण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जिससे किसी एक क्षेत्र में व्यवधान का समग्र प्रवाह पर सीमित प्रभाव पड़ता है।
मार्च के रेमिटेंस आंकड़े
आरबीआई की उप-गवर्नर ने कहा कि मार्च के रेमिटेंस आंकड़े पहले की तुलना में बेहतर रहे हैं, जो संभवतः लौटे प्रवासियों द्वारा लाए गए धन के कारण हो सकता है। उन्होंने बताया कि मौजूदा संघर्ष मुख्य रूप से होर्मुज स्ट्रेट तक सीमित है और इसका व्यापक असर पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र पर नहीं है। यदि कुछ प्रवासी वापस लौटते हैं, तो पुनर्निर्माण गतिविधियों के शुरू होने पर उनके लिए रोजगार के अवसर फिर से बढ़ सकते हैं। इन सभी कारणों से वह प्रेषण को लेकर चिंतित नहीं हैं।
महंगाई पर आरबीआई की टिप्पणी
महंगाई लक्ष्य निर्धारण पर गुप्ता ने कहा कि राज्यों के बीच महंगाई के विभिन्न रुझानों को देखते हुए भविष्य में ढांचे की समीक्षा के दौरान अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता हो सकती है। उन्होंने बताया कि महंगाई लक्ष्य ढांचे की अगली समीक्षा 2030-31 में होगी, जिसमें कोर महंगाई के आंकड़ों में अधिक पारदर्शिता, उपभोक्ता बास्केट के नियमित अपडेट और लक्ष्य सीमा में संभावित बदलाव जैसे मुद्दों पर विचार किया जा सकता है। हाल की समीक्षा में महंगाई लक्ष्य को चार प्रतिशत पर बरकरार रखा गया है, जिसमें दो प्रतिशत घट-बढ़ की अनुमति है।
