महिलाओं के योगदान को मान्यता: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
महिलाओं की भूमिका का महत्व
स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट किया था कि राष्ट्र का निर्माण केवल पुरुषों के प्रयासों से नहीं होता, बल्कि महिलाओं का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने इस विचार को अपने निर्णय में शामिल किया। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि महिलाएं केवल गृहिणी नहीं, बल्कि राष्ट्र की निर्माता हैं। इसका अर्थ यह है कि देश के विकास में नौकरी करने वाले व्यक्तियों के योगदान के समान ही घरेलू कार्य करने वाली महिलाओं का योगदान भी महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना में एक घरेलू कामकाजी महिला की मृत्यु के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी घरेलू कामकाजी महिला की मृत्यु होती है या वह काम करने में असमर्थ हो जाती है, तो मुआवजे का निर्धारण एक विशेष तरीके से किया जाएगा। मुआवजे की गणना में महिला द्वारा परिवार को प्रदान की जाने वाली घरेलू देखभाल के नुकसान को भी ध्यान में रखा जाएगा।
मामले का विवरण
यह मामला 25 नवंबर 2001 को सिरसा के फतेहाबाद में हुई एक दुर्घटना से संबंधित है, जिसमें एक महिला की मृत्यु हो गई। उनके तीन बच्चे थे और परिवार को मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल से 2 लाख रुपये का मुआवजा मिला। हालांकि, बीमा कंपनी ने घरेलू कार्य का मूल्य शून्य मान लिया। असंतुष्ट परिवार ने हाईकोर्ट में अपील की। सितंबर 2024 में पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर ₹8,43,000 कर दिया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसने महिला के घरेलू योगदान को ध्यान में रखते हुए कुल मुआवजा ₹62,77,900 निर्धारित किया।
फैसले की प्रमुख बातें
30 हजार रुपये प्रतिमाह का मानक: गृहिणी की मृत्यु पर मुआवजे के लिए 30 हजार रुपये प्रतिमाह न्यूनतम आय मानी जाएगी। मुआवजे की गणना में भविष्य की संभावनाएं और अन्य मदें जोड़ी जाएंगी।
कामकाजी महिलाओं पर भी लागू: यदि कोई महिला नौकरी के साथ घर का काम संभालती है, तो उसकी मृत्यु पर मुआवजे में 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर' का घटक जोड़ा जाएगा।
महिलाओं का जीडीपी में योगदान: कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के घरेलू कार्यों का जीडीपी में 17% योगदान होता है। 15 से 59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन 7 घंटे से अधिक अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं।
न्याय के लिए लंबा इंतजार: कोर्ट ने मुआवजा मामलों की लंबित अवधि पर ध्यान दिया, जिसमें कई मामलों में पीड़ितों को न्याय के लिए 15 से 18 वर्ष तक इंतजार करना पड़ा।
अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी
महिलाओं की श्रम भागीदारी दर (LFPR) भारत में विकसित देशों की तुलना में कम है। 2025 की जुलाई-सितंबर तिमाही में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 33.7% थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उम्मीद है कि घरेलू काम की कीमत को मापने का एक मानक स्थापित होगा, जिससे होममेकर्स का योगदान भी अर्थव्यवस्था में मान्यता प्राप्त करेगा।
नीतियों में बदलाव की आवश्यकता
अदालत ने पहले भी कहा है कि महिलाओं की घरेलू सेवाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस ताजा फैसले से आधी आबादी के योगदान को लेकर स्पष्टता आई है। समाज को भी इस बात को समझना होगा कि नीतियों में होममेकर्स का ध्यान रखा जाना चाहिए।
