महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक: सरकार का नया कदम विपक्ष की आपत्तियों के बीच

केंद्र सरकार ने लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े तीन विधेयक पेश किए हैं, जिनका विपक्ष ने कड़ा विरोध किया है। कांग्रेस और अन्य दलों ने इन विधेयकों को असंवैधानिक बताया है, जबकि सरकार का कहना है कि ये विधेयक महिला आरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने चर्चा के दौरान विपक्ष को बोलने का पूरा मौका देने की बात कही है। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा गया है और इसके संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं।
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महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक: सरकार का नया कदम विपक्ष की आपत्तियों के बीच gyanhigyan

महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पेश

केंद्र सरकार ने विपक्ष के तीव्र विरोध के बावजूद लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित तीन महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत किए हैं। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संविधान संशोधन और परिसीमन विधेयक पेश किया, जबकि गृह मंत्री अमित शाह ने केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित संशोधन विधेयक पेश किया। संविधान संशोधन विधेयक के पक्ष में 251 वोट पड़े, जबकि 185 सदस्यों ने इसके खिलाफ मतदान किया। सरकार का तर्क है कि महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए इन तीनों विधेयकों का एक साथ आना आवश्यक है।


विपक्ष की आपत्तियां और आरोप

कांग्रेस, सपा और द्रमुक जैसे कई विपक्षी दलों ने इन विधेयकों को 'असंवैधानिक' करार दिया है। कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने यह सवाल उठाया कि जब 2023 में महिला आरक्षण बिल पारित हो चुका था, तो इसे तुरंत लागू क्यों नहीं किया गया? उन्होंने सरकार पर 2029 के चुनावों से डरने का आरोप लगाया। इसके अलावा, अखिलेश यादव और अन्य नेताओं ने कहा कि जनगणना के बिना परिसीमन करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। विपक्षी नेताओं का मानना है कि इन परिवर्तनों से देश के संघीय ढांचे को नुकसान हो सकता है।


सरकार का पक्ष और चर्चा की तैयारी

विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि चर्चा केवल तकनीकी आधार पर होनी चाहिए, विधेयकों की अच्छाइयों या बुराइयों पर बाद में बात की जाएगी। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया कि चर्चा के दौरान विपक्ष को बोलने का पूरा अवसर दिया जाए, ताकि सरकार भी अपने पक्ष को मजबूती से रख सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये तीनों विधेयक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। दूसरी ओर, असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने चिंता व्यक्त की कि इससे दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है और हिंदी भाषी क्षेत्रों का दबदबा बढ़ सकता है।