महबूबा मुफ्ती के बयान से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में हलचल
महबूबा मुफ्ती के हालिया बयान ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में हलचल मचा दी है। उन्होंने दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए कश्मीर में बल प्रयोग को उचित ठहराया। इस पर राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं, जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस ने महबूबा के कथित दोहरे मापदंड पर सवाल उठाए हैं। इस विवाद ने 2016 में पैलेट गन के इस्तेमाल की यादें भी ताजा कर दी हैं। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा गया है।
| Jul 27, 2026, 14:22 IST
महबूबा मुफ्ती का विवादास्पद बयान
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के उपयोग को लेकर सियासी माहौल पहले से ही गर्म था। इसी बीच, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती के एक बयान ने घाटी की राजनीति में हलचल मचा दी है। महबूबा ने दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई का विरोध करते हुए कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग को आतंकवाद से लड़ाई का औचित्य बताया, जिसके बाद उन पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगने लगे। उनके इस बयान ने न केवल राजनीतिक विवाद को बढ़ावा दिया, बल्कि 2016 में पैलेट गन के इस्तेमाल और उनके चर्चित "दूध और टॉफी" वाले बयान की यादें भी ताजा कर दीं।
विवाद की शुरुआत
महबूबा मुफ्ती के बयान से विवाद की शुरुआत हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि दिल्ली और कश्मीर की परिस्थितियां भिन्न हैं। उनका तर्क था कि कश्मीर में सुरक्षा बल आतंकवाद से जूझ रहे हैं, इसलिए वहां की स्थिति को दिल्ली के छात्र आंदोलनों से नहीं जोड़ा जा सकता। लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन हर नागरिक का अधिकार है, तो क्या कश्मीर के युवाओं के अधिकारों की परिभाषा अलग है? क्या विरोध की आवाज उठाने वाला हर कश्मीरी स्वतः आतंकवाद के दायरे में आ जाता है?
नेशनल कॉन्फ्रेंस की प्रतिक्रिया
सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) ने इसी सवाल को तीखे अंदाज में उठाया। पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "अगर आप कश्मीरी हैं और अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं, तो आप पर बल प्रयोग करना तो बनता है।" यह टिप्पणी सीधे तौर पर महबूबा के कथित दोहरे मापदंड पर निशाना थी। नेकां के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने आरोप लगाया कि महबूबा मुफ्ती ने हर कश्मीरी प्रदर्शनकारी को "आतंकवादी" की तरह पेश करने की कोशिश की। उन्होंने इसे "शर्मनाक" बताते हुए कहा कि यह किसी पूर्व मुख्यमंत्री के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण सोच है।
महबूबा से माफी की मांग
नेकां के वरिष्ठ नेता और विधायक तनवीर सादिक ने महबूबा मुफ्ती से सार्वजनिक माफी की मांग की। उन्होंने सवाल किया कि क्या अब आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग करने वाले या शांतिपूर्ण विरोध करने वाले सभी लोग भी आतंकवादी कहलाएंगे? उनका कहना था कि लोकतांत्रिक विरोध और आतंकवाद के बीच की रेखा मिटाना बेहद खतरनाक सोच है। वहीं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, "महबूबा मुफ़्ती को कश्मीरियों के ख़िलाफ़ सत्ता के दुरुपयोग को सही ठहराने के लिए जंतर-मंतर जाने की बजाय घर पर ही रहना चाहिए था।"
2016 की यादें ताजा
महबूबा मुफ्ती के बयान ने इसलिए भी ज्यादा विवाद खड़ा किया क्योंकि इससे 2016 का वह दौर फिर चर्चा में आ गया, जब बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा और विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री थीं और पैलेट गन के इस्तेमाल में सैकड़ों युवा घायल हुए थे। उसी दौर में उनका चर्चित बयान, "क्या वे दूध और टॉफी लेने गए थे?", आज भी उनके राजनीतिक विरोधियों के सबसे बड़े हथियारों में शामिल है।
पीडीपी का बचाव
अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि उन्हें महबूबा के ताजा बयान से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने कभी कश्मीरी बच्चों की मौत और पैलेट गन के इस्तेमाल पर ऐसे बयान दिए हों, उससे अलग उम्मीद करना कठिन है। उन्होंने कहा कि 2016 की त्रासदी की पीड़ा आज भी हजारों परिवारों के दिलों में जिंदा है और राजनीतिक बयानबाजी उस दर्द को मिटा नहीं सकती।
पीडीपी का स्पष्टीकरण
हालांकि पीडीपी ने इन आरोपों को खारिज किया है। पार्टी नेता वहीद परा ने दावा किया कि महबूबा मुफ्ती के बयान को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से संपादित कर संदर्भ से हटाकर पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि महबूबा का आशय यह था कि जिन कठोर कानूनों और तरीकों का इस्तेमाल पहले जम्मू-कश्मीर में किया गया, वही अब देश के अन्य हिस्सों में भी लागू किए जा रहे हैं। वहीद परा ने कहा कि महबूबा दिल्ली में छात्र आंदोलन पर हुई कार्रवाई की आलोचना कर रही थीं और यह बता रही थीं कि कश्मीर में जो हुआ, वही अब पूरे देश में दोहराया जा रहा है।
सवालों का उठना
बहरहाल, पीडीपी की यह सफाई भी कई सवाल छोड़ जाती है। यदि वास्तव में बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, तो पूरा और बिना संपादित वीडियो सार्वजनिक करने में हिचक क्यों है?
