मनीष तिवारी की नाराजगी: कांग्रेस में संगठनात्मक बदलावों पर उठे सवाल
मनीष तिवारी, जो कभी कांग्रेस के जी-23 गुट के सदस्य रहे हैं, हाल ही में पंजाब कांग्रेस में हुए संगठनात्मक बदलावों से नाराज हैं। उन्होंने अपनी असहमति सोशल मीडिया पर व्यक्त की है, जबकि पार्टी ने उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी। तिवारी ने भारत-पाकिस्तान संबंधों पर भी स्पष्ट रुख अपनाया है, जिसमें उन्होंने आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी चिंताएं साझा की हैं। उनके विचार और कांग्रेस में उनकी स्थिति पर चर्चा करें।
| Jul 2, 2026, 15:01 IST
मनीष तिवारी की असंतोष की वजह
कांग्रेस के पूर्व असंतुष्ट गुट जी-23 के सदस्य मनीष तिवारी एक बार फिर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। पंजाब कांग्रेस में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए हाल ही में हुए संगठनात्मक बदलावों के बाद उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है, जिससे उनकी असहमति स्पष्ट हो गई है। चंडीगढ़ से लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व पर आरोप नहीं लगाया, लेकिन उनके शब्दों में गहरी निराशा और असहमति झलक रही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि क्या किसी व्यक्ति या संस्था में प्रतिभा और क्षमता होना सबसे बड़ा दोष है? काश उनके पास असुरक्षाओं का कोई समाधान होता। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कांग्रेस ने उन्हें पिछले पैंतालीस वर्षों में बहुत कुछ दिया है और उन्होंने भी पार्टी की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया है.
पंजाब कांग्रेस में नए बदलाव
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के तहत कई महत्वपूर्ण समितियों की घोषणा की है। चरणजीत सिंह चन्नी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि विजय इंदर सिंगला को चुनाव प्रबंधन और समन्वय समिति की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर समिति का प्रमुख बनाया गया है और अमर सिंह को घोषणा पत्र समिति की कमान दी गई है। इसके अलावा, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और प्रताप सिंह बाजवा को विधायक दल का नेता बनाए रखने का निर्णय लिया गया है। पार्टी ने तीन कार्यकारी अध्यक्षों की भी नियुक्ति की है, लेकिन मनीष तिवारी को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। इसे केवल संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि अंदरूनी शक्ति संतुलन का संकेत माना जा रहा है.
मनीष तिवारी की स्वतंत्र सोच
मनीष तिवारी की नाराजगी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह लंबे समय से कांग्रेस नेतृत्व से भिन्न विचार रखने वाले नेताओं में शामिल रहे हैं। जी-23 समूह में शामिल होकर उन्होंने संगठनात्मक सुधार, सक्रिय नेतृत्व और आंतरिक लोकतंत्र की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि पार्टी को वास्तविकताओं का सामना करना चाहिए। यही कारण है कि उन्हें कांग्रेस के भीतर एक स्वतंत्र विचारधारा रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है.
भारत-पाकिस्तान संबंधों पर मनीष तिवारी की राय
भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर मनीष तिवारी ने फिर से राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर समेत कई बुद्धिजीवी भारत-पाक वार्ता बहाल करने की मांग कर रहे हैं, जबकि मनीष तिवारी ने इसका विरोध किया है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग बैसरन नरसंहार को भूल चुके हैं और निर्दोष पर्यटकों की हत्या को याद दिलाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान दशकों से भारत के खिलाफ आतंकवाद का सहारा लेता रहा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर मनीष तिवारी का रुख
मनीष तिवारी ने कई बार पार्टी लाइन से अलग जाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाया है। 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि भारत की पाकिस्तान से केवल एक अपेक्षा है कि वह आतंकवाद का निर्यात बंद करे। उन्होंने भारत-पाक संबंधों को सामान्य बनाने की मांग को भावुक और वास्तविकताओं से कटे हुए बताया।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में मनीष तिवारी को जिम्मेदारी नहीं मिलना केवल संगठनात्मक उपेक्षा नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्र और मुखर राजनीति का परिणाम भी हो सकता है। हालांकि, उन्होंने संयमित भाषा का प्रयोग किया है, लेकिन उनके हालिया बयान यह संकेत देते हैं कि कांग्रेस के भीतर विचारधारा और नेतृत्व शैली को लेकर मतभेद अभी भी बने हुए हैं। मनीष तिवारी ने यह स्पष्ट किया है कि उनके लिए पार्टी से ऊपर देशहित और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे हैं, और वह इन पर समझौता नहीं करेंगे.
