भारतीय रुपये की गिरावट: क्या 100 रुपये प्रति डॉलर का स्तर केवल एक मानसिकता है?

मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक तनाव के चलते भारतीय रुपये में गिरावट आई है, जिससे यह 100 रुपये प्रति डॉलर के स्तर के करीब पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक मानसिकता है। आरबीआई के हस्तक्षेप और विदेशी निवेशकों की चिंताओं के बीच, रुपये की स्थिति पर गहन चर्चा हो रही है। जानें इस विषय पर और क्या कहते हैं विशेषज्ञ।
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रुपये की गिरावट का कारण

मिडिल ईस्ट में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में वृद्धि हुई है, जिसका प्रभाव भारतीय रुपये पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। गुरुवार को, रुपया डॉलर के मुकाबले 96.96 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के हस्तक्षेप और तेल की कीमतों में थोड़ी कमी के बाद, रुपये में कुछ सुधार हुआ और यह 96.36 पर बंद हुआ। शुक्रवार को भी रुपये ने लगभग 96 के स्तर पर स्थिरता बनाए रखी।


100 रुपये प्रति डॉलर का डर

रुपये के 100 प्रति डॉलर तक पहुंचने की संभावना को लेकर बाजार में एक मानसिक भय व्याप्त है। अरविंद पनगढ़िया, 16वें वित्त आयोग के चेयरमैन, का कहना है कि 100 केवल एक संख्या है, जैसे 99 या 101। उनका मानना है कि वैश्विक कारणों से रुपये को कृत्रिम रूप से संभालने की कोशिशें लंबे समय तक सफल नहीं हो सकतीं और इससे विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट सकता है।


विदेशी निवेशकों की चिंताएं

यदि आरबीआई रुपये को बचाने के लिए अत्यधिक हस्तक्षेप करता है, तो यह विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का कारण बन सकता है। इससे भारत में निवेश का जोखिम बढ़ सकता है और विदेशी पूंजी बाहर जा सकती है। मेटलाइफ इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट के पोर्टफोलियो मैनेजर एंडर्स फैरगेमैन के अनुसार, यदि रुपया 100 के करीब पहुंचता है, तो निवेशकों को अधिक रिटर्न की मांग होगी, जिससे भारत में निवेश महंगा हो सकता है।


वर्तमान स्थिति की तुलना 2013 से

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियाँ 2013 जैसी नहीं हैं, जब भारत में महंगाई और चालू खाता घाटा अधिक था। अब स्थिति काफी मजबूत है। हालांकि, इस वर्ष रुपये में 7% से अधिक की गिरावट आई है, फिर भी खुदरा महंगाई लगभग 3.5% पर स्थिर है। पनगढ़िया का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि रुपये में थोड़ी कमजोरी और उससे उत्पन्न महंगाई को संभाल सकती है।


आरबीआई की ब्याज दर नीति

सूत्रों के अनुसार, आरबीआई के भीतर यह विचार बन रहा है कि रुपये को बचाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे कर्ज महंगा होगा और आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। भारत की आर्थिक विकास दर पहले से ही धीमी पड़ने के संकेत दे रही है।


विदेशी फंडों की निकासी

मिडिल ईस्ट संकट के बीच, विदेशी निवेशकों ने 2026 में भारतीय शेयर बाजार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाले हैं, जबकि भारतीय बॉंड मार्केट में केवल 1.3 अरब डॉलर का निवेश किया गया है। वैश्विक निवेशकों का मानना है कि तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रह सकती हैं, जो भारत के लिए नकारात्मक है।


कमजोर रुपये के संभावित लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल संकट कुछ महीनों या एक वर्ष में कम हो जाता है, तो कमजोर रुपया भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे आयात में कमी आएगी और भारतीय निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार सस्ते लगने लगेंगे, जिससे भविष्य में बड़ा निवेश वापस आ सकता है।