भारतीय मानकों की आवश्यकता: दिल की बीमारियों के लिए नया दृष्टिकोण

भारत में दिल की बीमारियों के इलाज के लिए विदेशी मानकों पर निर्भरता की समस्या पर चर्चा की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय संदर्भ में मानकों का विकास आवश्यक है। डॉ. मोहित गुप्ता ने बताया कि भारतीय मरीजों के लिए विशेष मानकों की आवश्यकता है, ताकि समय पर बीमारी की पहचान और उपचार किया जा सके। जानें कैसे भारतीय मानक दिल की बीमारियों की रोकथाम में मदद कर सकते हैं।
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दिल की बीमारियों के लिए भारतीय मानकों की आवश्यकता

भारत में कई बीमारियों का इलाज अभी भी विदेशी मानकों पर निर्भर करता है। इन बीमारियों का पता लगाने के लिए भी विदेशी मानकों का उपयोग किया जाता है। इस संदर्भ में, भारतीय चिकित्सकों ने एक शोध शुरू किया है, जिसमें यह सुझाव दिया गया है कि एक भारतीय मानक विकसित किया जाना चाहिए। दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. मोहित गुप्ता ने एक मीडिया चैनल से बातचीत में बताया कि भारत में कई ऐसे कारक हैं जो दिल की बीमारियों को प्रभावित करते हैं, जबकि अन्य देशों में ऐसा नहीं होता। इसलिए, भारतीय मानकों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।


विदेशी मानकों की समस्याएं

डॉ. मोहित ने बताया कि विदेशी मानकों के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत मरीजों को कम जोखिम वाला बताया गया, जबकि भारतीय संदर्भ में वे उच्च जोखिम में थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि रोकथाम के दृष्टिकोण से चूक हो रही है। इसलिए, इन मानकों का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। यदि भारत के लिए विशेष मानक विकसित किए जाएं, तो इससे स्थानीय लोगों में बीमारियों की पहचान और उपचार में मदद मिलेगी।


विदेशी मानकों की परिभाषा

विदेशी मानकों में मुख्यतः आयु और एलडीएल (खराब कोलेस्ट्रॉल) जैसे कारकों पर ध्यान दिया जाता है। हालांकि, भारतीय रोगियों में कम उम्र और कम एलडीएल स्तर पर भी बीमारियों का विकास हो सकता है, लेकिन विदेशी मानकों के अनुसार भारतीयों का मूल्यांकन कम किया जाता है। इससे समय पर बीमारी की पहचान में कठिनाई होती है।


अनदेखी किए जा रहे कारक

डॉ. मोहित ने बताया कि दक्षिण एशियाई लोगों में इंसुलिन प्रतिरोध, लिपोप्रोटीन(ए), एपोबी, मोटापा, सामाजिक-आर्थिक तनाव, और किडनी रोग जैसी समस्याएं हैं। इन सभी कारकों के आधार पर भारतीय मानकों का विकास आवश्यक है। इसमें भारतीयों की डाइट और बीमारियों के जोखिम कारकों को शामिल करना चाहिए, ताकि समय पर बीमारी की पहचान में सहायता मिल सके।