भारत सरकार का COP 33 की मेजबानी से पीछे हटना: कांग्रेस सांसद की चिंता

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने भारत सरकार द्वारा 2028 में COP 33 की मेजबानी से पीछे हटने के निर्णय पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सरकार की जलवायु प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह निर्णय राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है। रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी की पूर्व में की गई घोषणाओं और वर्तमान में उठाए गए कदमों के बीच असंगति को भी उजागर किया। इस निर्णय के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है, जिससे जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के प्रति सरकार के इरादों पर सवाल उठते हैं।
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भारत सरकार का COP 33 की मेजबानी से पीछे हटना: कांग्रेस सांसद की चिंता

कांग्रेस सांसद का बयान

कांग्रेस के सांसद जयराम रमेश ने भारत सरकार द्वारा 2028 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP 33) की मेजबानी का प्रस्ताव वापस लेने पर चिंता व्यक्त की है। यह बयान 2015 के पेरिस समझौते के बाद जलवायु पहलों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर उठते सवालों के बीच आया है। इस निर्णय की जानकारी 2 अप्रैल, 2025 को एशिया-प्रशांत समूह को दी गई थी। इससे पहले, दिसंबर 2023 में संयुक्त अरब अमीरात में COP-28 के उच्च स्तरीय सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने COP 33 की मेजबानी की इच्छा जताई थी।


जलवायु प्रतिबद्धताओं पर सवाल

रमेश ने सरकार की कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों के प्रति गंभीरता पर संदेह जताया और कहा कि प्रस्ताव वापस लेने का निर्णय जलवायु प्रतिबद्धताओं के प्रति सरकार की अनिच्छा को दर्शाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आगामी 2029 के आम चुनावों से पहले COP 33 का राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है। रमेश ने सोशल मीडिया पर मोदी द्वारा दिसंबर 2023 में की गई घोषणा को भी उजागर किया, जिसमें प्रधानमंत्री ने गर्व से कहा था कि भारत वैश्विक जलवायु सम्मेलन की मेजबानी करेगा। इस वादे के विपरीत हालिया निर्णय पर सवाल उठाते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार की मंशा राजनीतिक हो सकती है।


अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौतों का महत्व

रमेश ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौतों के प्रभावों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने आगामी अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) की सातवीं आकलन रिपोर्ट के महत्व को रेखांकित किया, जो 2028 से पहले जारी होने वाली है, और जलवायु परिवर्तन पर कड़ी कार्रवाई की संभावित मांगों का उल्लेख किया। सम्मेलन की मेजबानी से अचानक हटने के निर्णय के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है, जिससे सरकार की जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के प्रति इरादों पर सवाल उठते हैं।


COP 33 से हटने का प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी अक्सर किसी राष्ट्र की वैश्विक छवि को बढ़ाने का अवसर होती है। इस संदर्भ में, COP 33 से हटना भारत की अंतरराष्ट्रीय जलवायु भागीदारी रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। रमेश ने जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री मोदी की 2014 में की गई टिप्पणियों का भी उल्लेख किया, जो अतीत और वर्तमान के बीच असंगति को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की हालिया कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत द्वारा की गई प्रतिबद्धताओं के अनुरूप नहीं है।