भारत-रूस संबंध: ऊर्जा संकट के बीच बढ़ती तेल आपूर्ति
भारत की ऊर्जा नीति और रूस का सहयोग
भारत ने ईरान युद्ध के दौरान ऊर्जा संकट का सामना करते हुए खुद को मजबूर नहीं होने दिया है। देश न केवल अपनी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है, बल्कि 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों को भी तेल की आपूर्ति कर रहा है। इस संकट के बीच भारत में तेल या गैस की कमी नहीं होने का मुख्य कारण रूस है, जो संकट के समय में भरपूर मात्रा में तेल और गैस भेज रहा है। मार्च 2026 में भारत ने रूस से तेल का आयात दोगुना कर 90 प्रतिशत तक पहुंचा दिया है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के कारण तेल और गैस का आयात प्रभावित हुआ है। ऐसे में भारत ने रूस से तेल खरीद बढ़ा दी है। अमेरिका ने रूसी तेल पर 30 दिनों की छूट दी है, जिसका भारत ने भरपूर लाभ उठाया है। फरवरी 2026 में भारत ने रूस से प्रतिदिन 10.6 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा, जो मार्च में बढ़कर 20.6 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया। इसके अलावा, रूस ने भारत के लिए LPG सप्लाई बढ़ाने का आश्वासन भी दिया है।
युद्ध के कारण मध्य पूर्व के देशों से तेल और गैस का आयात कम हुआ है, जिससे भारत ने रूस से खरीद को बढ़ाने का निर्णय लिया। रूसी कंपनियां भारतीय बाजार में तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस की आपूर्ति बढ़ाने के लिए तैयार हैं। अमेरिका के प्रतिबंधों और 25 प्रतिशत टैरिफ के कारण भारत ने कुछ समय के लिए रूसी तेल से दूरी बनाई थी, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। मार्च 2026 में भारत और रूस के बीच तेल की आपूर्ति फिर से रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
हाल ही में, एक ईरानी तेल लेकर आ रहा जहाज, जो 600000 टन तेल लेकर भारत आ रहा था, ने अचानक अपना रास्ता बदलकर चीन की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, यह जहाज 4 अप्रैल को गुजरात पोर्ट पर पहुंचने वाला था, लेकिन पेमेंट की समस्याओं के कारण उसने अपना मार्ग बदल लिया।
