भारत में लिंग और लैंगिक पहचान पर सुप्रीम कोर्ट में बहस

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लिंग और लैंगिक पहचान के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। 'वुमेन्स डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया' द्वारा दायर याचिका में लिंग के द्विध्रुवीय स्वभाव और ट्रांसजेंडर अधिकारों पर सवाल उठाए गए हैं। इस याचिका के माध्यम से, केरल में ट्रांसजेंडर महिलाओं के चुनावी अधिकारों और अन्य संवैधानिक संरक्षणों पर चिंता व्यक्त की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, जिससे महिला और ट्रांसजेंडर अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक नई कानूनी बहस शुरू हो गई है।
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सुप्रीम कोर्ट में लिंग पहचान का मामला


नई दिल्ली । पश्चिमी देशों में जैविक लिंग और लैंगिक पहचान के बीच के भेद पर चल रही बहस अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई है। 'वुमेन्स डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया' (WDII) द्वारा दायर की गई याचिका में यह दावा किया गया है कि लिंग स्वाभाविक रूप से द्विध्रुवीय है और इसे सर्जरी, हार्मोन उपचार या स्व-पहचान के माध्यम से परिवर्तित नहीं किया जा सकता।


याचिका में यह भी कहा गया है कि केवल लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता मिलने से किसी व्यक्ति को महिलाओं को मिलने वाले संवैधानिक और वैधानिक संरक्षण का अधिकार नहीं मिल जाता। केरल में दो ट्रांसजेंडर महिलाओं द्वारा महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायत सीटों पर चुनाव लड़ने, महिला खेलों में भागीदारी, और महिला हॉस्टलों में प्रवेश जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए याचिका में गहरी चिंता व्यक्त की गई है। यह याचिका न केवल संसद द्वारा पारित ट्रांसजेंडर कानून के 2026 के संशोधनों को चुनौती देती है, बल्कि 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम और 2014 के ऐतिहासिक 'नाल्सा' (NALSA) फैसले पर भी सवाल उठाती है।


प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागछी और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और इसे अन्य लंबित याचिकाओं के साथ संबद्ध कर दिया है। 2019 के अधिनियम ने व्यक्तियों को अपनी स्व-महसूस की गई लैंगिक पहचान चुनने का अधिकार दिया था, लेकिन हाल के संशोधनों के बाद अब मेडिकल बोर्ड के समक्ष पेश होना और मजिस्ट्रेट से प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया है।


मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने भारत में ट्रांस-एक्सक्लूजनरी रेडिकल फेमिनिस्ट (TERF) विचारधारा के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की है। वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल का कहना है कि भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में ट्रांसजेंडर समुदाय की हमेशा एक विशिष्ट और स्वीकार्य उपस्थिति रही है, और इस प्रकार के विवादों का उठना भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक नया मोड़ है। सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका के जुड़ने से देश में महिला अधिकारों और ट्रांसजेंडर अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक नई कानूनी और सामाजिक बहस शुरू हो गई है।