भारत में मानसून की शुरुआत: बारिश की उम्मीदें और कृषि पर प्रभाव

भारत में मानसून ने केरल में दस्तक दे दी है, जिससे वर्षा ऋतु की शुरुआत हो गई है। मौसम विभाग के अनुसार, इस वर्ष बारिश का अनुमान दीर्घकालिक औसत का लगभग 90 प्रतिशत रह सकता है। अल नीनो जैसी परिस्थितियों का विकास चिंता का विषय है, जो मानसून को प्रभावित कर सकता है। जानें इस वर्ष के मानसून का कृषि और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
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मानसून का आगमन

देशभर में गर्मी के प्रकोप के बीच, आखिरकार मानसून ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून गुरुवार को केरल में पहुंच गया, जिससे चार महीने तक चलने वाली वर्षा ऋतु की औपचारिक शुरुआत हो गई है। आमतौर पर, मानसून एक जून के आस-पास केरल में आता है, लेकिन इस बार इसकी एंट्री में कुछ दिनों की देरी हुई है.


पहले के अनुमान और वास्तविकता

मौसम विभाग ने पहले अनुमान लगाया था कि मानसून 26 मई के आसपास केरल में पहुंच सकता है। हालांकि, मौसम की परिस्थितियों में बदलाव के कारण इसकी प्रगति धीमी रही, और अंततः चार जून को यह केरल में दाखिल हुआ।


मानसून का विस्तार

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की जानकारी के अनुसार, मानसून ने केवल केरल ही नहीं, बल्कि लक्षद्वीप, दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व अरब सागर के अन्य हिस्सों, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों, कोमोरिन क्षेत्र और बंगाल की खाड़ी के कई हिस्सों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले दिनों में मानसून धीरे-धीरे अन्य राज्यों की ओर बढ़ेगा, जिससे वर्षा गतिविधियों में वृद्धि हो सकती है.


कृषि पर मानसून का महत्व

मानसून भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश की एक बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, और खरीफ फसलों की बुवाई मुख्य रूप से मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। पर्याप्त वर्षा से खेती को लाभ होता है, जलाशय भरते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। इसके विपरीत, कम बारिश से फसल उत्पादन, पेयजल की उपलब्धता और खाद्य कीमतों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.


वर्षा पूर्वानुमान में संशोधन

हाल ही में मौसम विभाग ने अपने मौसमी वर्षा पूर्वानुमान में संशोधन किया है। विभाग का अनुमान है कि इस वर्ष देश में कुल बारिश दीर्घकालिक औसत का लगभग 90 प्रतिशत रह सकती है। 1971 से 2020 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में मानसून के दौरान औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर मानी जाती है। यदि कुल वर्षा इस औसत के 90 प्रतिशत से कम रहती है, तो इसे "अल्प वर्षा" की श्रेणी में रखा जाएगा.


अल नीनो का प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ष प्रशांत महासागर में अल नीनो जैसी परिस्थितियों का विकास चिंता का विषय है। अल नीनो एक मौसमीय स्थिति है जो अक्सर भारतीय मानसून को प्रभावित करती है और कई बार वर्षा में कमी का कारण बनती है। मौसम विभाग के अनुसार, वर्तमान में अल नीनो की दिशा में धीरे-धीरे बढ़ने की संभावना है.


भविष्य की संभावनाएं

विभाग का अनुमान है कि जून के दौरान अल नीनो का प्रभाव कमजोर रह सकता है, लेकिन सितंबर तक यह मध्यम या मजबूत रूप ले सकता है। यदि ऐसा होता है, तो मानसून के अंतिम चरण में वर्षा की मात्रा प्रभावित हो सकती है. पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन और वैश्विक मौसमीय बदलावों के कारण मानसून के पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिले हैं। ऐसे में इस वर्ष के मानसून पर किसानों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की नजर बनी हुई है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि मानसून की रफ्तार और वर्षा का वितरण देश की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए कितना लाभकारी साबित होता है.