भारत में दल-बदल की राजनीति: संविधान की चुनौतियाँ और संभावनाएँ

भारत में दल-बदल की राजनीति ने हाल के दिनों में एक नई दिशा ली है, जहां ममता बनर्जी की TMC और उद्धव ठाकरे की शिवसेना जैसे प्रमुख दलों में बदलाव देखने को मिल रहा है। गोवा में दलबदल विरोधी कानून पर चल रहे मामले ने इस मुद्दे को और भी जटिल बना दिया है। इस लेख में, हम दलबदल के पीछे के कारणों, संविधान की दसवीं अनुसूची में दिए गए प्रावधानों और राजनीतिक दलों के बीच हो रहे विलय की शर्तों पर चर्चा करेंगे। क्या यह बदलाव भारतीय राजनीति में स्थायी परिवर्तन लाएगा? जानने के लिए पढ़ें।
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दल-बदल की स्थिति

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नियंत्रण कमजोर हो रहा है, जबकि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के छह सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए हैं। इसी तरह, दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) के सात सांसद बीजेपी में शामिल हो गए हैं। यह दल-बदल की प्रक्रिया भारत के विभिन्न हिस्सों में तेजी से चल रही है। गोवा में दल-बदल विरोधी कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जो इस स्थिति पर प्रकाश डालता है। विपक्षी दलों में हो रहे इस बदलाव के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होने वाले नेताओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है: संविधान की दसवीं अनुसूची में दलबदल विरोधी कानून के तहत क्या अपवाद हैं?


राजनीतिक बदलाव की बयार

इस साल अप्रैल में, राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात में से दस राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी का दामन थाम लिया। मई में चुनाव परिणामों के बाद, पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अपनी पहली सरकार बनाई, और अब टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) में विलय का ऐलान किया है। इसी समय, शिवसेना (UBT) के नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने का निर्णय लिया है।


दलबदल विरोधी कानून का इतिहास

भारत का दलबदल विरोधी कानून 1985 में लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य उन विधायकों या सांसदों को अयोग्य ठहराना है जो अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ते हैं या पार्टी के निर्देशों का पालन नहीं करते। प्रारंभ में, इस कानून में विभाजन और विलय के लिए दो प्रकार की छूट दी गई थी, लेकिन 2003 में विभाजन की छूट को हटा दिया गया। अब केवल विलय की छूट ही बची है, जो दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत आती है।


विलय की शर्तें

इस कानून के तहत, यदि मूल राजनीतिक पार्टी किसी अन्य पार्टी में विलय करती है, तो विधायक या सांसद को सुरक्षा मिलती है। इसके लिए, संबंधित लेजिस्लेचर पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति आवश्यक है। यदि इन दोनों हिस्सों को एक साथ पढ़ा जाए, तो मूल पार्टी को पहले विलय करना होगा, जबकि अलग-अलग पढ़ने पर केवल दो-तिहाई वोट की आवश्यकता होती है।