भारत में टेलिकॉम कंपनियों की उपभोक्ता धोखाधड़ी और सोशल मीडिया के खतरनाक प्रभाव

भारत में टेलिकॉम कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं के साथ किया जा रहा धोखा और सोशल मीडिया के अनियंत्रित प्रभावों पर एक गंभीर चर्चा। रिचार्ज कूपन की वैधता और बच्चों पर सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों के बारे में जानें। क्या सरकारें इस दिशा में ठोस कदम उठाएंगी? जानिए इस लेख में।
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भारत में टेलिकॉम कंपनियों की उपभोक्ता धोखाधड़ी और सोशल मीडिया के खतरनाक प्रभाव

टेलिकॉम कंपनियों की धोखाधड़ी

भारत में टेलिकॉम कंपनियों द्वारा ग्राहकों के साथ एक गंभीर लेकिन सूक्ष्म धोखा लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है। रिचार्ज कूपन को "एक महीने" की वैधता बताकर बेचा जाता है, जबकि वास्तव में इसकी अवधि केवल 28 दिनों की होती है। 30 दिन का पैसा लेकर 28 दिन की सेवा देना उपभोक्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन है। पूरी दुनिया में एक महीना 30 या 31 दिनों का होता है, ऐसे में 28 दिनों की सेवा को एक महीने के रूप में प्रस्तुत करना न तो तार्किक है और न ही नैतिक।


उपभोक्ताओं को होने वाला नुकसान

इस व्यवस्था का सीधा असर आम उपभोक्ता पर पड़ता है। एक साल में 12 महीने होते हैं, लेकिन 28 दिनों की वैधता के कारण ग्राहकों को 12 की बजाय 13 बार रिचार्ज कराना पड़ता है। इसका मतलब है कि बिना किसी अतिरिक्त सेवा के टेलिकॉम कंपनियां ग्राहकों से एक महीने का अतिरिक्त पैसा वसूल करती हैं। यह एक प्रकार का "छिपा हुआ शुल्क" है, जिसे चतुराई से सामान्य बना दिया गया है।


नियामक संस्थाओं की भूमिका

दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने समय-समय पर निर्देश दिए हैं कि कुछ रिचार्ज प्लान 30 दिनों की वैधता के साथ उपलब्ध कराए जाएं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ये निर्देश केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं। सवाल यह है कि जब नियामक संस्था मौजूद है, तो उपभोक्ताओं के हितों की प्रभावी रक्षा क्यों नहीं हो पा रही है?


सोशल मीडिया का बेलगाम स्वरूप

सोशल मीडिया का अनियंत्रित स्वरूप भी एक गंभीर मुद्दा है। भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रभावी नियमन की कमी के कारण बच्चों और किशोरों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। आजकल 10 साल से कम उम्र के बच्चे भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, फर्जी उम्र बताकर अकाउंट बना रहे हैं और ऐसी सामग्री के संपर्क में आ रहे हैं जो उनकी मानसिक सेहत और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।


ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण

ऑस्ट्रेलिया ने किशोरों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए सख्त कानून बनाकर एक मिसाल पेश की है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारत कब इस दिशा में ठोस कदम उठाएगा? यह मुद्दा केवल बच्चों का नहीं है। सोशल मीडिया पर फर्जी अकाउंट्स के माध्यम से देशविरोधी गतिविधियां, अफवाहें और नफरत फैलाने वाली सामग्री भी बढ़ रही हैं। यह स्थिति न केवल समाज के लिए, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।


सरकार की जिम्मेदारी

अब समय आ गया है कि सरकारें केवल मूक दर्शक न बनें। चाहे वह टेलिकॉम कंपनियों की उपभोक्ता-विरोधी नीतियां हों या सोशल मीडिया का अनियंत्रित फैलाव, दोनों मामलों में सख्त और प्रभावी कानूनी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। अन्यथा, इसका खामियाजा आम नागरिक, आने वाली पीढ़ियों और अंततः पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा।